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माया तेरे नाम की

माया तेरे नाम की

दोस्तो, माया शब्द के कई अर्थ होते हैं। तुमने लोगों को कहते हुए सुना होगा - सब ईश्वर की माया है या दुनिया में आकर मनुष्य मोह-माया में फंस जाता है अथवा उस व्यक्ति के मन में जरा सी भी ममता-माया नहीं है। इसके अर्थ क्रमशः लीला, मोह और ममता होते हैं। इनके अलावा माया के और भी अर्थ होते हैं जैसे धोखा, कपट, जादू आदि। इस शब्द का एक अर्थ धन-दौलत भी होता है। यह कहानी इसी अर्थ को लेकर है।

किसी कस्बे में परसराम नाम का एक आदमी रहता था। वह अपने मोहल्ले में अपने घर के बाहर ही एक परचून की दुकान चलाता था। उसमें घर-गृहस्थी की जरूरतों की छोटी-मोटी चीजें मिल जाती थीं जैसे दाल, चावल, चीनी, घी, तेल, मसाले, चाय-पत्ती आदि। दुकान छोटी होने के कारण उसकी आमदनी भी थोड़ी थी, इसलिए वह एक छोटा दुकानदार समझा जाता था। मोहल्ले के सभी लोग उसे परसा-परसा कह कर बुलाते थे। किसी के घर में दाल-चावल अचानक खत्म हो जाते तो बच्चे से कहा जाता - जाओ दौड़ कर परसा से ले आओ। गली के नुक्कड़ पर चाय वाले की दुकान पर चाय-पत्ती खत्म हो जाती तो वह अपने नौकर से कहता - जाकर परसा की दुकान से चाय-पत्ती ले आओ।

परसराम बहुत सुबह ही अपनी दुकान खोल लेता था और देर रात गए तक दुकान पर बैठा रहता था। इस तरह वह मोहल्ले के लोगों की छोटी-मोटी जरूरत की चीजें सुबह से रात तक देता था। वह ईमानदार और मेहनती था, इसलिए कुछ सालों में उसने अच्छा पैसा कमा लिया और कस्बे के मुख्य बाजार में एक बड़ी दुकान भी ले ली। घर के बाहर वाली दुकान पर उसका लड़का बैठने लगा, जो बड़ा हो गया था। बड़ी दुकान का काम वह खुद संभालता था। चूंकि परसराम के पास अब थोड़ी दौलत हो गई थी, इसलिए लोग उसे परसा न कह कर परसी लाला कहने लगे।  परसराम व्यापार में तो कुशल था ही, वह व्यवहार-कुशल भी था। कुछ सालों बाद उस की मेहनत, ईमानदारी और कुशलता रंग लाई और वह एक बड़ा व्यापारी बन गया। अब उसने जमीन खरीद कर एक बहुत बड़ी दुकान बनवा ली, जिसमें जरूरत का हर सामान मिलता था। उस दुकान पर कई नौकर काम करते थे। परसराम तो एक तरफ गद्दी पर बैठा केवल हुक्म चलाता था। दौलत खूब हो जाने के कारण उसने एक नया आलीशान मकान भी बनवा लिया था। आने-जाने के लिए एक गाड़ी भी उसने खरीद ली थी। अब सब लोग उसे लाला परसराम जी कहने लगे। दुकान के सामने से गुजरने वाला हर व्यक्ति उसे नमस्कार करता और कहता- राम राम लालाजी। परसराम का एक बचपन का दोस्त दूसरे शहर में काम करता था। बीच-बीच में वह अपने कस्बे में आया करता था। कई वर्षों के बाद जब वह कस्बे में आया तो परसराम के ठाठ देख कर दंग रह गया। उसे मालूम था कि परसराम ने किस तरह अपनी मेहनत और ईमानदारी से दौलत इकट्ठी की है। उसे यह भी मालूम था कि लोग किस तरह दौलत के पीछे भागते हैं, इसलिए उसके मुंह से अचानक निकल पड़ा - माया तेरे तीन नाम, परसा परसी, परसराम। इसका अर्थ यही है कि सब दौलत के पीछे भागते हैं। जब दौलत कम थी तो लोग उसे परसा कहते थे, कुछ और दौलत हुई तो परसी लाला कहने लगे और जब खूब दौलत हो गई तो लाला परसराम कहने लगे। बस तभी से यह एक कहावत बन गई।

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