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दो टूक

हरियाणा के ढराणा गांव के गहलोत परिवार को मुल्क की तरक्कीपसंद अवाम का सलाम! गोत्र विवाद में खाप पंचायत की मनमानी से जूझते इस कुनबे ने गांव छोड़ दिया, मगर बहू नहीं छोड़ी। जिस देश की परंपरा में धोबी के कहने पर राजाओं द्वारा रानियों के परित्याग की कहानियां हों, वहां गहलोत परिवार का हठ बड़ा साहसपूर्ण, सच्च और सराहनीय है।

गहलोत कुटुंब के लोग गांव से खदेड़ दिए गए हैं। इसके बावजूद वे टूटे नहीं हैं। अब उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाज खटखटाया है। सवाल लेकिन यह है कि क्या यह परिवार अकेला ही संघर्ष करता रहेगा? क्या व्यापक प्रगतिवादी समाज उनकी मदद को आगे बढ़ेगा? समलैंगिक विवाह जैसे विषयों तक पहुंच चुका समाज क्या इस पर भी ध्यान देगा कि गांव-देहात में बसने वाली उसकी बहुसंख्यक आबादी तो अभी सगोत्र विवाह पर ही अटकी पड़ी है!

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