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मेट्रो में श्रम कानून लागू क्यों नहीं

क्या आप मजदूरों की लूट और हत्या पर खड़ी की जा रही मेट्रो रेल में सुकून के साथ सफर कर सकेंगे? क्या आप किसी ऐसी परिवहन व्यवस्था से सफर करना पसंद करेंगे,जिसकी नींव ईंट गारे से नहीं बल्कि मजदूरों के शोषण और उनकी लाशों से बनी है? इसी तरह के सवाल उठाते हुए सैकड़ों मेट्रो मजदूरों और उनके परिजनों ने बुधवार को जंतर मंतर पर प्रदर्शन करते हुए आरोप लगाया कि मेट्रो निर्माण में लगे मजदूरों की मौत के लिए दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन है।

इस संबंध में मेट्रो कामगार संघर्ष समिति की तरफ से केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री, दिल्ली की मुख्य मंत्री और डीआरएमसी के कमिश्नर को ज्ञापन भी दिया गया। ज्ञापन में आरोप है कि मेट्रो रेल के निर्माण कार्यो के दौरान मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। श्रम कानून की धज्जियां उड़ायी जा रही हैं। मेट्रो में काम करने वालों के पास कोई परिचय पत्र नहीं है। मेट्रों के निर्माण से परिचालन तक का काम ठेका प्रथा पर है। न्यूनतम मजदूरी कानून मेट्रो पर लागू क्यों नहीं है,जबकि श्रम कानून तो सभी नियोक्ता कंपनियों पर लागू होते हैं।

ज्ञापन में इस बात का खुलासा भी किया गया है कि मेट्रो निर्माण में लगे मजदूरों को जो सेफ्टी हेलमेट मुहैया कराये जाते हैं, वह मामूली पत्थर की चोट तक सहन नहीं कर पाते हैं। ज्ञापन में मेट्रो स्टेशनों पर सफाई कार्य में लगे मजदूरों को कानून 5 हजार 300 रुपया प्रतिमाह मानदेय न देकर सिर्फ 2800 से 3000 रुपया ही दिया जा रहा है। यह सौ दिन काम की गारंटी वाली नरेगा योजना के मजदूरों को दी जा रही रकम से भी कम है।

मेट्रो कामगार संघर्ष समिति के संयोजक अजय स्वामी ने कहा है कि सरकार, श्रम विभाग और मजदूरों के हितलाभ देखने के लिए बनीं एजेन्सियां भी इस मुद्दे पर चुप हैं लेकिन समिति का संघर्ष जारी रहेगा।

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