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एक बयान ने पलटी बाजी

कांग्रेस के पास खुश होने के कारण थे। दो दशक बाद उसने उत्तर प्रदेश से लोकसभा की इतनी सारी सीटें जीतीं थीं। इसने मायावती और मुलायम सिंह दोनों को ही परेशान कर दिया था। उसे न सिर्फ धार्मिक अल्पसंख्यकों के वोट मिले थे, बल्कि लगभग सभी जातियों के मतदाताओं ने उसे पसंद किया था।

लेकिन रीता बहुगुणा जोशी ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को वह मौका दे दिया, जिसका वे इंतजार कर रहीं थीं। उनके भाषण की अब तक काफी चर्चा हो चुकी है और उस पर काफी टिप्पणियां भी आ चुकी हैं। मुरादाबाद के सांसद और पूर्व क्रिकेटर अजहरुद्दीन उनके साथ खड़े हैं। लेकिन रीता बहुगुणा ने एक महिला और वो भी ऊंचे पद पर पहुंचने वाली दलित के खिलाफ बोलकर पिछले पांच साल में राहुल गांधी के सारे किए कराए पर पानी फेर दिया। राहुल ने कांग्रेस को एक ऊंचाई तक पहुंचाया था, लेकिन रीता ने उसे फिर से नीचे पहुंचा दिया। रीता बहुगुणा की गिरफ्तारी के बाद राहुल ने अमेठी में मायावती की आलोचना की। उन्होंने कहा कि मायावती के लिए बिजली से ज्यादा जरूरी हैं उनकी अपनी मूर्तियां और वे विकास की बजाय प्रतीकों की राजनीति कर रही हैं। राहुल ने कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्षा रीता बहुगुणा के लिए कहा कि उनका गुस्सा जायज था लेकिन उनके शब्द नाजायज।

जहिर है राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को मायावती के खिलाफ जनता के गुस्से का मंच बनाना चाहते हैं। क्यों न हो, उत्तर प्रदेश में 75 फीसदी से ज्यादा वोटर दलित नहीं हैं और इसमें उन्हें एक संभावना भी दिखती होगी। बसपा के उदय के बाद इसे सबसे पहले मुलायम सिंह यादव ने समझा था और 2002 तक समाजवादी पार्टी को न सिर्फ पिछड़ों बल्कि किसानों की पार्टी बनाए रखा। ये वे वर्ग थे जो राजनीति में दलितों को अहमियत दिए जाने से नाराज थे। वे शिक्षा में पिछड़े थे और सरकारी नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी खासी कम थी। फिर कृषि की अहमियत भी घट रही थी इसलिए वे बसपा के खिलाफ एकजुट हो गए।

लेकिन कांग्रेस ने दूसरा रास्ता आजमाया। उसने मायावती पर सीधा हमला बोलने की कोशिश नहीं की। अपनी दादी की शैली के विपरीत उन्होंने किसी के व्यक्तित्व को ज्यादा तूल नहीं दी। राहुल ने काफी सावधानी बरती। लोकसभा चुनाव के एकदम आखिरी दौर में वह समय आया, जब कांग्रेस ने मुख्यमंत्री की खुलकर आलोचना शुरू की। और अब जब गंगा जमुना के मैदान पर कब्जे की असली जंग शुरू हुई है तो रीता बहुगुणा ने मायावती को जवाबी हमला बोलने का आधार दे दिया है। आम चुनाव में बसपा ने ऊंची जतियों के वोटरों को लुभाने की भरसक कोशिश की थी। इसका ज्यादा फायदा नहीं मिल सका। इससे दलितों और निचली जतियों के मन में यह भावना बनी कि यह सरकार उनकी अपनी नहीं है।
लेकिन यह सब अब इतिहास हो चुका है। जो भाषा इस्तेमाल की गई, वह शिव सेना की भाषा से भी ज्यादा अभद्र थी। बहुत कम लोगों को मुंबई की 1990 की वह घटना याद है जब दलितों के एक प्रदर्शन के बाद शिव सेना के कार्यकर्ताओं ने हुतात्मा चौक की बाकायदा धुलाई की थी। उत्तर प्रदेश में इस तरह का पिछला हंगामा 1995 में गेस्ट हाउस कांड के दौरान हुआ था। वहां की हिंसा मौखिक नहीं वास्तविक थी, इसके बाद से कभी भी बसपा और समाजवादी पार्टी एक साथ नहीं आ सके।

कांग्रेस ने खुद को रीता के बयान से अलग कर लिया है, लेकिन सोनिया गांधी खुद इसे करतीं तो शायद यह ज्यादा असरदार होता। इससे भी अच्छा यह रहता कि अगर प्रदेश पार्टी अध्यक्षा को साफ-साफ यह कह दिया जता कि वे मुंह सिल लें और अपना ध्यान पार्टी के आंतरिक स्थिति पर लगाएं। यह भी हो सकता है कि पिछले 11 साल में सोनिया गांधी की टीम ने उत्तर प्रदेश में जो साख बनाई थी, उसे अब नए सिरे से काम करना पड़े। कांग्रेस अब उत्तर प्रदेश में सीमित आधार वाली स्वर्ण हिंदू पार्टी होकर रह गई है।
पिछले आम चुनाव में उत्तर प्रदेश में बसपा का आधार खिसकने का कारण ज्यादातर विशेषज्ञों ने यही बताया है कि अमीर ठेकेदारों और रिटायर अफसरों पर ज्यादा ध्यान देने की नीति को उसके समर्थकों ने ज्यादा पसंद नहीं किया। इसके बावजूद बसपा एक बड़ी ताकत बनी हुई है। प्रदेश की 80 संसदीय सीटों में उसने 21 पर जीत हासिल की और 45 पर वह दूसरे नंबर पर रही। और अब जो हुआ है उससे बसपा का दलित आधार और मजबूत होगा। अब बसपा कानून और व्यवस्था के नाम पर अपने विरोधियों से ज्यादा सख्ती से पेश आती दिखाई देगी। अभी कुछ ही दिन पहले उसने चुनाव पूर्व के भाषण के लिए वरुण गांधी के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल किया है। पिछले साल ऐसा ही कदम पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के खिलाफ उठाया था। इसके पहले के कार्यकाल में उन्होंने राजा भैया के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की थी।

मायावती की अपनी दिक्कतें हैं। रीता के बयान के बाद जो हुआ वह भी निंदनीय है। एक विधायक समेत पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ रपट दर्ज हुई है, लेकिन क्या ये आरोप ज्यादा ठहर पाएंगे? पूरा देश यह देखना चाहता है कि क्या वे अपने समर्थकों के प्रति भी उतनी ही सख्त हैं, जितनी कि अपने विरोधियों के प्रति। उत्तर प्रदेश के हालात भी बहुत अच्छे नहीं हैं। बसपा को खुद से पूछना होगा कि 2007 में वह जिस जंगल राज के खात्मे के नाम पर सत्ता में आई थी उसकी याद दो साल में इतनी धुंधली क्यों पड़ गई। शायद यही वजह है कि उत्तर प्रदेश ने पार्टी की नेता को केंद्र में भेजने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। सिर्फ तीन फीसदी वोटों की कमी से उनका स्वप्न धाराशायी हो गया। जनमत में थोड़ा सा बदलाव भी ऐसी योजनाओं पर पानी फेर सकता है।

दलितों में निराशा के कई और कारण भी हैं। शिक्षा दलितों के सशक्तिकरण का बहुत बड़ा तरीका हो सकती है, लेकिन इसकी कोई बड़ी कोशिश नहीं दिखाई देती। अभी भी हर चार में तीन दलित निरक्षर हैं। न ही दलितों के बीच से कोई ऐसा नया व्यापारी वर्ग उभरा है, जो नए आर्थिक अवसरों का लाभ उठा पाया हो। शिक्षा और संपत्ति एक तरह के आत्मसम्मान का बोध पैदा करती है। लेकिन दूसरी तरफ आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा कर कांग्रेस ने अपना बुरा खुद कर लिया है। लेकिन बसपा इस मौके का कितना फायदा उठा पाएगी यह अभी नहीं कहा जा सकता।

rangaranjan.mahesh@gmail.com

लेखक राजनीतिक टिप्पणीकार हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रवक्ता हैं

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