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धर्म के नाम पर

हमारे धर्म के साथ बहुत तरह की पूजा-अर्चना, मेले, यात्रा आदि जुड़े रहे हैं, पर हाल ही में एक नई यात्रा देखने में आई है- कांवड़ यात्रा। यह यात्रा कुछ साल पहले चर्चा में आई, पर अब इसका चलन तेजी से बढ़ता जा रहा है। हम हर ऐसी यात्रा से भावविभोर होते हैं, मन में श्रद्धा-भक्ति जगती है। पर कांवड़-यात्रा की शुरुआत मन में डर को जन्म देती है।

इधर कुछ साल में इसने ऐसा रूप धारण कर लिया है कि सड़कें, स्कूल, उद्योग-धंधे और बस बंद हो जाते हैं। दिन हो या रात एक-दो कांवड़िए हों या पूरा जत्था इनके लिए सड़क पर यातायात रोक दिया जाता है। यह अच्छी बात है कि जगह-जगह इनके ठहरने के लिए तंबू लगाए जाते हैं, बढ़िया भोजन दिया जाता है। दरअसल हमारी भक्ति का एक रूप यह भी है कि हम खुद नहीं जा रहे तो जाने वालों पर खर्च कर पुण्य कमाना चाहते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि कांवड़ियों के इस तरह के व्यवहार को बर्दाश्त किया जाए।

हम धार्मिक काम अपना जीवन संवारने के लिए करते हैं, तो हमें सरकार या आम जनता से कोई भी अपेक्षा क्यों होनी चाहिए? यह सवाल तो पूछा ही जना चाहिए कि धार्मिक कर्म के लिए यात्रा करने वालों की प्रवृत्ति इतनी हिंसात्मक क्यों है? सरकार और समाज इस हिंसा के आगे असहाय क्यों दिख रहे हैं? कांवड़ मार्ग पर एक छोटी सी घटना के बाद कावड़ियों के एक हुजूम ने एक अधेड़ व्यक्ति को इतना मारा कि उसे आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा। इसके साथ ही गाड़ियों वगैरह के साथ जो तोड़ फोड़ की गई वह अलग। धर्म इंसानों के कल्याण से हटकर अचानक ही हिंसात्मक कैसे बन जाता है? कांवड़ ले जाना उसकी इच्छा या शिव प्रेम का प्रतीक है। यह किसी पर एहसान नहीं है। कावड़ियों की सुख-सुविधा का ख्याल रखने की व्यवस्था बनाना अगर हमारे समाज की विलक्षणता है तो उनकी उद्दंडता को नजरंदाज करना कहीं हमारी कमजोरी तो नहीं?

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