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मंदी के दौर में भी गीता प्रेस की रफ्तार कायम

मंदी के दौर में भी गीता प्रेस की रफ्तार कायम

पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर के शेखपुर इलाके की एक इमारत में पुस्तकों के संपादन और छपाई के काम में लगे कर्मचारियों के लिए वैश्विक आर्थिक मंदी की चर्चा दूर के शोर से अधिक और कुछ नहीं है।

करीब 200 कर्मचारियों के साथ धार्मिक पुस्तकों के प्रकाशन और मुद्रण का काम कर रही विख्यात गीता प्रेस, गोरखपुर के कामकाज पर वैश्विक मंदी का कोई असर नहीं है। देश-दुनिया में हिंदी, संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं में प्रकाशित धार्मिक पुस्तकों, ग्रंथों और पत्र-पत्रिकाओं की बिक्री कर रही गीता प्रेस को भारत में घर-घर में रामचरित मानस और भगवद्गीता को पहुंचाने का श्रेय जाता है।

गीता प्रेस के ट्रस्टी वैजनाथ अग्रवाल ने कहा कि 2008-09 में हमने 32 करोड़ रुपये मूल्य की किताबों की बिक्री की। यह आंकड़ा इससे पिछले साल की तुलना में 2.5 करोड़ रुपये ज्यादा है। बीते वित्त वर्ष में गीता प्रेस ने पुस्तकों की छपाई के लिए 4,500 टन कागज का इस्तेमाल किया।

करीब 90 साल पहले यानी 1923 में स्थापित गीता प्रेस द्वारा अब तक 45.45 करोड़ से भी अधिक प्रतियों का प्रकाशन किया जा चुका है। इनमें 8.10 करोड़ भगवद्गीता और 7.5 करोड़ रामचरित मानस की प्रतियां हैं। गीता प्रेस में प्रकाशित महिला और बालोपयोगी साहित्य की 10.30 करोड़ प्रतियों पुस्तकों की बिक्री हो चुकी है। अग्रवाल ने कहा, मंदी के दौर में भी गीता प्रेस की पुस्तकों की मांग कम नहीं हुई है।

गीता प्रेस की लोकप्रिय पत्रिका कल्याण की हर माह 2.30 लाख प्रतियां बिकती हैं। अग्रवाल ने कहा, बिक्री के पहले बताए गए आंकड़ों में कल्याण की बिक्री शामिल नहीं है। उन्होंने कहा कि गीता प्रेस की पुस्तकों की मांग इतनी ज्यादा है कि यह प्रकाशन हाउस मांग पूरी नहीं कर पा रहा है। औद्योगिक रूप से पिछडे¸ पूर्वी उत्तर प्रदेश के इस प्रकाशन गृह से हर साल 1.75 करोड़ से ज्यादा पुस्तकें देश-विदेश में बिकती हैं।

गीता पे्रस के प्रोडक्शन मैनेजर लालमणि तिवारी कहते हैं, हम हर रोज 50,000 से ज्यादा किताबें बेचते हैं। दुनिया में किसी भी पब्लिशिंग हाउस की इतनी पुस्तकें नहीं बिकती हैं। धार्मिक किताबों में आज की तारीख में सबसे ज्यादा मांग रामचरित मानस की है। अग्रवाल ने कहा कि हमारे कुल कारोबार में 35 फीसदी योगदान रामचरित मानस का है। इसके बाद 20 से 25 प्रतिशत का योगदान भगवद्गीता की बिक्री का है।

अग्रवाल कहते हैं, गीता प्रेस की पुस्तकों की लोकप्रियता की वजह यह है कि हमारी पुस्तकें काफी सस्ती हैं। साथ ही इनकी प्रिटिंग काफी साफसुथरी होती है और फोंट का आकार भी बड़ा होता है। हमारा उददेश्य मुनाफा कमाना नहीं है। हम सदप्रचार के लिए पुस्तकें छापते हैं। गीता प्रेस की पुस्तकों में हनुमान चालीसा, दुर्गा चालीसा और शिव चालीसा की कीमत एक रुपये से शुरू होती है।

गुजराती, असमिया, तमिल, बांग्ला, तेलुगू, कन्नड़ और उड़िया में हनुमान चालीसा का दाम सिर्फ डेढ़ रुपये है। यहां की सबसे महंगी किताब महाभारत है, जिसके पूरे सेट का दाम 1,350 रुपये है। देश ही नहीं विदेशों खासकर अमेरिका में गीता प्रेस की किताबों की काफी मांग है। हर साल गीता प्रेस से 3-4 लाख रुपये की रामचरित मानस अमेरिका भेजी जाती है। तिवारी कहते हैं कि अमेरिका में बड़ी संख्या में एनआरआई रहते हैं, जिनमें भारत की धार्मिक किताबों की काफी मांग है।

गीता प्रेस के कुल प्रकाशनों की संख्या 1,600 है। इनमें से 780 प्रकाशन हिंदी और संस्कृत में हैं। शेष प्रकाशन गुजराती, मराठी, तेलुगू, बांग्ला, उड़िया, तमिल, कन्नड़, अंग्रेजी और अन्य भारतीय भाषाओं में हैं। रामचरित मानस का प्रकाशन नेपाली भाषा में भी किया जाता है।

तमाम प्रकाशनों के बावजूद गीता प्रेस की मासिक पत्रिका कल्याण की लोकप्रियता कुछ अलग ही है। माना जाता है कि रामायण के अखंड पाठ की शुरुआत कल्याण के विशेषांक में इसके बारे में छपने के बाद ही हुई थी। कल्याण की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि शुरुआती अंक में इसकी 1,600 प्रतियां छापी गई थीं, जो आज बढ़कर 2.30 लाख पर पहुंच गई हैं। गरुड़, कूर्म, वामन और विष्णु आदि पुराणों का पहली बार हिंदी अनुवाद कल्याण में ही प्रकाशित हुआ था।

गीता प्रेस की पुस्तकों की बिक्री 18 निजी थोक दुकानों के अलावा हजारों पुस्तक विक्रेताओं और 30 प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर बने गीता प्रेस के बुक स्टॉलों के जरिए की जाती है।

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