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खालीपन का दर्द 'एम्पटी नेस्ट सिन्ड्रोम'

खालीपन का दर्द 'एम्पटी नेस्ट सिन्ड्रोम'

बच्चे अपनी जिंदगी की डोर थामे आकाश की ऊंचाइयां छूने चले गए और अपनी जरूरतों और खुशियों को रंग देने में मसरूफ हैं। पति अपने काम और घर की आíथक जरूरतों को पूरा करने में व्यस्त हैं। ऐसे में पारिवारिक दायित्वों से लगभग मुक्त, जीवन के चालीस से ऊपर वसंत और पतझड़  में सारे सुख-दुख ङोल चुकी घर की स्वामिनी, जिसके ऊपर पूरे परिवार की हर छोटी-बड़ी जिम्मेदारी थी, हर सदस्य की देख-रेख और जरूरतों को पूरा करने में जिसे पूरे दिन भर में कुछ पल भी अपने लिए नहीं मिलते थे, आज निपट अकेली है। घर-परिवार के सभी दायित्वों और जरूरतों के बीच चकरघिन्नी-सी घूमती जिंदगी की अभ्यस्त परिवार की धुरी की तरह हर सदस्य को एक छोर से अपने से बांधे गृहस्वामिनी के लिए उम्र के इस पड़ाव पर लगभग खाली रह कर समय को काटने की हर पल नाकाम कोशिश करना किसी सजा से कम नहीं है। कमोबेश यह स्थिति हर उस घरेलू महिला की है, जो 40-50 के दौर से गुजर रही है और अपनी जिम्मेदारियों से कमोबेश फारिग हो चुकी है। जीवन अब मजा नहीं, सजा-सा लगता है।

बेहद व्यस्त घरेलूजिंदगी जी कर जीवन के उत्तरार्ध में खालीपन से जूझती, पति और बच्चों के लिए अपने जीवन के सुनहरे पल ही नहीं, वर्ष समíपत कर चुकी महिलाएं, जिनके पास इस समय निभाने को जिम्मेदारियां शेष नहीं रहीं और करने के नाम पर कुछ भी नहीं, बेहद तनाव और अवसाद से ग्रस्त हो जाती हैं। इस तनाव और एकाकीपन को एम्प्टी नेस्ट सिन्ड्रोम का नाम दिया जाता है। यह वह स्थिति है, जब पति और बच्चों की अपनी व्यस्तजिंदगी के बीच वह निपट अकेली रह जाती है।

प्रज्ञा कहने को बेहद सुखी हैं। उनके पति का बिजनेस सफलता के हर पड़ाव को पार कर रहा है और आíथक तौर पर सम्पन्नता की कोई कमी नहीं। बेटा विदेश में एम.बी.ए. की पढ़ाई कर के वहीं परिवार सहित बस चुका है और बेटी भी बेहद सम्पन्न, अच्छे परिवार में विवाह के बाद सुखी और खुशहाल है। हर तरफ तस्वीर में खुशियां ही खुशियां दिखाई देती हैं, लेकिन  प्रज्ञा हमेशा दुखी और उदास सी रहती हैं। जीवन की तमाम जिम्मेदारियों को सफलता से निबाह चुकी  प्रज्ञा आज जीवन के सूनेपन से त्रस्त हैं। परिवार के सभी सदस्य अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त हैं और घर में पसरा खालीपन ही प्रज्ञा की दुनिया है और फलस्वरूप तनाव और अवसाद से स्वयं को निकाल पाना उनके लिए नामुमकिन होता जा रहा है।

बेबस मन खालीपन के आंगन में चक्कर काटता-काटता तनाव का शिकार नहीं होगा तो क्या होगा? खासतौर पर बच्चों से अत्यधिक जुड़ाव महसूस करने वाली मां के लिए जब उसके बच्चों के पास ही समय नहीं रहता तो वे अवसाद का शिकार बन कर रह जाती है। हालांकि वह यह भी जानती है कि उसके साथ कुछ अनोखा नहीं घट रहा। पति के काम और उनकी व्यस्तता को भी दोष नहीं दे सकती और बच्चों के अपने करियर और अपनी दुनिया में रम जाने पर भी शिकायत नहीं कर सकती। यहां तक कि बच्चों को सेटल करने की सबसे ज्यादा जल्दी भी उसे ही होती है। अपने हर स्वार्थ को त्याग कर अपनाया गया यह अकेलापन ही उसे तनावग्रस्त और उपेक्षित महसूस कराए तो वह क्या करे। कोई जवाब नहीं सूझता तो वह इस मोड़ पर खुद को व्यर्थ औरजिंदगी को खत्म हुआ समझती है।

लेकिन जिंदगी को यूं खत्म हुआ मान लेना भी तोजिंदादिली नहीं है। यह सत्य से पलायन और तथ्यों से मुंह फेरना है। जरूरत है तो नयी खुशियों को ढूंढम्ने की, उन्हें समेट करजिंदगी को नए रंगों से सजाने की, तभीजिंदगी का आसमान खुशियों के इन्द्रधनुष-सा खूबसूरत हो पाएगा। समझे इशारा- विशेषज्ञ एम्प्टी नेस्ट सिन्ड्रोम से जूझती महिलाओं के लिए कुछ लक्षण बताते हैं, जिन्हें वक्त रहते समझ कर उससे बचाव के लिए कारगर प्रयास किए जा सकते हैं। ऐसी महिलाओं में डिप्रेशन या अवसाद सबसे मुख्य लक्षण होता है, जो कई बार उनकी जीवन के प्रति निराशाजनक बातों और रवैये से भी लक्षित होता है तो कई बार वे अपने मन की पीड़ा को तन की पीड़ा के रूप में भी बयान करती हैं। किसी भी काम में रुचि का अभाव, अपनी ओर ध्यान खींचने का यथासंभव प्रयास तो कभी कभार बिल्कुल नाउम्मीदी का अहसास, यह सब भी एम्प्टी नेस्ट सिण्ड्रोम से पीडि़त महिलाओं की तकलीफ की ओर इशारा करता है। ऐसी स्थिति से उबरने के लिए चिकित्सकीय सलाह और काउंसिलग से काफी लाभ मिल सकता है।

हिम्मत से करें सामना - एम्प्टी नेस्ट सिण्ड्रोम की स्थिति उन महिलाओं के लिए विशेषकर बेहद भयावह हो जाती है, जिन्होंने अपनी युवावस्था के संपूर्ण वर्ष परिवार को बनाने और संभालने में व्यतीत कर दिए हों और ऐसे में जब परिवार में उनकी कोई भूमिका नहीं रह जाती और उनके पास अपने शौक या काम के नाम पर कुछ नहीं होता तो खुद को अचानक किसी नए सांचे में ढालना उनके लिए केवल शून्य से शुरू करने जैसा होता है। तलाकशुदा या वैधव्य से जूझ रही रही स्त्रियों के लिए तो यह वह समय होता है, जब वे मेनोपॉज की तकलीफों से भी गुजर रही होती हैं यानी कुल मिलाकर यह त्रासदी ङोलना उनके लिए काफी मशक्कत भरा होता है, लेकिन सामना तो हिम्मत से ही करना होगा।

अकेलेपन की त्रासदी में खुद को डुबो लेने की बजाए अपने मन का आंगन तलाशें। इसे सकारात्मक रूप से लेते हुए मन को समझाएं कि जीवन ने अब आपको समय दिया है कि अब तक हुई अपने व्यक्तित्व की उपेक्षा को आप कुछ सकारात्मक रूप दें, उसे संवारे, सराहें। सबसे ज्यादा जरूरी है कि आप अपने आप से प्यार करें। बरसों परिवार की जरूरतों को प्राथमिकता मानते हुए अपने लिए वक्त न निकाल पाने की कमी को इस दौर में पूरा करें।अपनी जिंदगी के भूल चुके शौक और पसंदीदा गतिविधियों के बारे में सोचें और उसी कार्य में स्वयं को व्यस्त कर लें। अकेलेपन से जूझ रही अपने जैसी अन्य महिलाओं के साथ मिल कर समूह बनाएं। किटी पार्टी, बुक क्लब, म्यूजिक ग्रुप या हैल्थ क्लब बना कर इसे अंजाम दें।
सुबह-शाम की सैर और ताजी हवा भी आपके तनाव को दूर करने में एक नेचुरल हीलर का काम करेगी।

नई तकनीकों की जानकारी आज के दौर में जितनी जरूरी है, उतनी ही यह आपको व्यस्त रखने में भी समर्थ है। खासतौर पर कम्प्यूटर के साथ आप समय भी बिता सकेंगी और इससे आपका ज्ञान भी बढम्ेगा। साथ ही वीडियो-कांफ्रेंसिंग से बच्चों से भी संपर्क रख सकती हैं। रिश्तेदारों से मेल-जोल भी आपके तनाव को दूर रखेगा और पुराने दोस्त, जिनसे आप सालों से अपनी व्यस्त दिनचर्या के चलते नहीं मिल पाईं, उनसे दुबारा मिलना आपको बहुत खुशी देगा।

अपनी पसंदीदा जगहों पर घूमने के लिए, जीवन का यह समय जिसे आप तनाव में गुजार रही हैं बेहद उपयुक्त है, जिसका आप सार्थक प्रयोग कर सकती हैं। अपनी जैसी महिलाओं के साथ मिल कर ‘सेल्फ हैल्प ग्रुप’ बनाएं और अपने समय को सार्थक तरीके से जीने में एक-दूसरे की साथी बनें।

लंबे सालों तक घर की धुरी रही महिला उस वक्त खुद को अकेला महसूस करने लगती है, जब बच्चे बड़े होकर अपनी नौकरी में तल्लीन हो जाते हैं और पति अपने कामों में मसरूफ रहता है। ऐसे में महिला को लगता है कि जिस गुलशन को उसने अपना पूरा जीवन देकर तैयार किया था, आज वही उजड़-सा गया है। ऐसे में महिलाएं अक्सर अवसाद का शिकार हो जाती हैं। डॉक्टर्स इसे एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम का नाम देते हैं। आखिर क्या है यह सिंड्रोम और कैसे इससे निपटा जा सकता है।

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