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राष्ट्रीय महत्व की धरोहर की सुधि लेने की चिंता एएसआई को नहीं

राष्ट्रीय महत्व की धरोहर की सुधि लेने की चिंता एएसआई को नहीं

राष्ट्रीय महत्व के विक्रमशिला महाविहार का अवशेष देखरेख के अभाव में ढह रहा है। अगर यही हाल रहा तो इसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। अवशेष पर बड़ी-बड़ी घास ही नहीं पीपल और बरगद के पेड़ तक उग आए हैं। अगर आप इसके अवशेष को छूने का प्रयास करेंगे तो डर है कहीं यह भराभरा न जाए। ईंट में नोनी लग चुकी है। 

अपने गौरवशाली अतीत को संरक्षित करने की जगह ऐसी उपेक्षा समझ से परे है। भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) की लापरवाही की वजह से संरक्षण व रासायनिक लेपन नहीं होने के कारण विक्रमशिला विश्वविद्यालय के विभिन्न अवशेष पूरी तरह खस्ता हालत में हैं।

एएसआई को सुधि लेने की भी चिंता नहीं है। नतीजतन अवशेषों की अत्यंत जर्जर स्थिति को लेकर पर्यटक निराश और हताश हो उठते हैं। परिसर स्थित महाबोधि मंदिर और प्रमुख चैतन्य (मुख्य स्तूप) की स्थिति सर्वाधिक दयनीय है। मुख्य स्तूप और इसके चारों और प्रदक्षिणा पथ की दीवालों में न सिर्फ नोनी लग चुकी है बल्कि ईंटे खराब होती जा रही हैं। अगर समय रहते युद्धस्तर पर इसके संरक्षण और संवर्धन के कार्य नहीं कराये गये तो अगले कुछ माह में सैकड़ों वर्ष पुरानी यह धरोहर विनष्ट हो जाएगी और इसी के साथ समाप्त हो जएगा विक्रमशिला के इतिहास का साक्ष्य।

अधिकांश अवशेषों पर जंगल-झड़ियां उग आई हैं जिनकी साफ-सफाई की जरूरत एएसआई ने अबतक महसूस नहीं की । मुख्य स्तूप की ईंट के लगातार खराब होते रहने के कारण इसके अंदर बरसात का पानी प्रवेश करता जा रहा है जो प्रमुख अवशेषों को समूल नष्ट करने के लिए काफी है। इतना ही नहीं,जर्जर हो चुके इन अवशेषों के अंदर सांप-बिच्छुओं का बसेरा होने की आशंका प्रबल हो गई है जो पर्यटकों के लिए खतरे का सबब हो सकते हैं।

यही हाल छात्रावास, पुस्तकालय, मनौती स्तूप, तिब्बती धर्मशाला, जैन और हिन्दू मंदिरों के अलावा ध्यान कक्षों का है। संपूर्ण परिसर जंगल झड़ियों से पट गया है जो घूमने वालों के लिए खतरनाक है। प्रदक्षिणा पथ की दीवालों में लगी टेराकोटा प्लेटों में से अधिकतर तो पूर्व में ही अस्तित्वहीन हो चुकी हैं। बची टेराकोटा प्लेटों में उत्कीर्ण आकृतियां रासायनिक लेपन व सरंक्षण के अभाव में चौपट होती जा रही हैं।

इसकी दयनीय व जर्जर स्थिति को देखने से ऐसा प्रतीत होता है मानो एएसआई ने राष्ट्रीय महत्व की इस प्राचीन धरोहर को समूल नष्ट करने का बीड़ा उठा लिया है। एएसआई कर्मियों की लंबी-चौड़ी फौज संरक्षण और विकास के नाम पर हर वर्ष लाखों-लाख खर्च करती है। जन प्रतिनिधियों का उदासीन रवैया भी न सिर्फ पर्यटकों, शोधकर्ताओं और इतिहासकारों की भावनाओं के साथ कुठाराघात कर रहा है बल्कि पुरातात्विक अवशेषों के साथ घोर खिलवाड़ भी।

 

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  • Web Title:ऐसे तो ढह जाएगा विक्रमशिला महाविहार का अवशेष