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अमेरिकी बैसाखी और कबीर की साखी

अमेरिकी विदेशमंत्री हिलरी क्लिंटन अपनी भारत यात्रा दिग्विजयी अभियान वाली मुद्रा में संपन्न कर लौट चुकी हैं। उन्होंने अपने दौरे को अमेरिका के हित में भुनाने की भरसक कोशिश की। मुंबई में अपना डेरा सबसे पहले उन्होंने उसी ताज होटल में डाला, जो कुछ ही माह पहले दहशतगर्दी का शिकार हुआ था। उन्होंने स्मारक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए और शोकसंतप्त परिवारों के प्रति संवेदना प्रकट की, मानो यह दिखला रही हों कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में भारत और अमेरिका एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। भारत की नौजवान बिंदास बेफिक्र (लापरवाह) पीढ़ी को मोहित करने के लिए उन्होंने फिल्मी हीरो आमिर खान से मुलाकात की। हिलरी ने गैर सरकारी स्वयंसेवी संगठनों की राजस्थानी पोशाक पहने महिलाओं के साथ कुछ रंगीन फोटो भी खिचवाईं। दोस्ती के प्रमाण देने के बाद ही दिल्ली में वह बातचीत शुरू हो सकती थी, जिसको लेकर अनेक जिम्मेदार और जागरूक भारतीय नागरिक आशंकित हैं।

पिछले दिनों यह बात बिल्कुल साफ हो चुकी है कि जिस आतंकवाद की मार भारत सहता आ रहा है, उसे ओबामा हिलरी क्लिंटन का अमेरिका उस आतंकवाद का हिस्सा नहीं मानता, जिसका शिकार 9/11 को वह खुद हुआ था। जब अमेरिकी सरकार यह ऐलान करती है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही आतंकवाद के शिकार हैं तो वह बेहद अन्यायपूर्ण तरीके से दोनों को तराजू के पलड़ों पर एक सा वजन देकर तौलती है, इस बात को सरासर अनदेखा करते हुए कि भारत में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने वाले खूनी दस्ते पाकिस्तान से पठाए जाते हैं, जबकि पाकिस्तान में दहशतगर्दी का स्वरूप स्वदेशी है। पाकिस्तान को कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवादी हिंसा का निशाना इसलिए बनना पड़ रहा है कि वह उस अमेरिका का साथी, सहयोगी और संधि मित्र है, जिसे इस्लामी जगत अपना प्रमुख शत्रु समझता है। यह कहना बेमानी है कि एटमी हथियारों की वजह से दक्षिण एशिया आज सबसे जोखिम भरा विस्फोटक संकट स्थल बन चुका है। इसके लिए भी अमेरिका कम जिम्मेदार नहीं। पाकिस्तानी एटम बम के जनक डॉ. ए. क्यू. खान की परमाणविक तस्करी के प्रति वह वर्षों आंखें मूंदे रहा था। आज जब अफ-पाक वाली भू-राजनैतिक अवधारणा स्थापित की जाती है तो भारत का अवमूल्यन अनायास ही अमेरिकी सामरिक प्राथमिकता में हो जाता है। जी-8 की बैठक में यह बात जगजाहिर हो चुकी है कि अमेरिका का राजनय ‘इस हाथ दे और दूसरे से वापस ले’ वाला है। कुल मिलाकर हिलरी क्लिंटन की भारत यात्रा का एक लक्ष्य है- भारत को परमाणविक अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर के लिए राजी करना।

हिलरी या उनके राष्ट्रपति इस बात से बेखबर नहीं कि इस करार के मुद्दे पर ही मनमोहन सरकार गिरते-गिरते बची थी। जिन परिस्थितियों में उसकी जान बची थी, उनकी याद न दिलाना ही बेहतर है। आज अगर इस सबके बावजूद अमेरिकनों का भारत के साथ मनमानी करने का हौसला बढ़ा है तो सिर्फ इसीलिए कि साझा सरकार पर अंकुश लगाने वाले वामपंथी दल खुदकुशी कर चुके हैं। कांग्रेस पार्टी मनचाहे से अधिक बहुमत पा चुकी है और प्रधानमंत्री को लगता है कि वह अमेरिका और पाकिस्तान के बारे मे नया इतिहास रच सकते हैं।
 
दुर्भाग्य से पाकिस्तान उनका साथ नहीं दे रहा। शर्म अल शेख में गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के साथ जो संयुक्त बयान हमारे प्रधानमंत्री ने जारी किया था, वह उनके घर लौटने से पहले ही विवादों में घिर चुका है और इसमें बलूचिस्तान का उल्लेख एक भयंकर भूल ही नहीं, भविष्य में जानलेवा शूल साबित हो सकता है। इस तरह की नादानी वह भी है कि आतंकवाद के मुद्दे को भारत-पाक संवाद से अलग कर दिया गया है। अब आप चाहे लाख गाल बजाएं कि इस बार कश्मीर का नामोल्लेख नहीं हुआ है पर क्या कोई भी व्यक्ति यह आशा कर सकता है कि इस विवाद को निपटाए बिना भारत-पाक संवाद रत्तीभर प्रगति कर सकता है। हाल के दिनों में कश्मीर की घाटी फिर से खौलने लगी है। छोटी-छोटी घटनाएं जो खुद सुनियोजित साजिश का हिस्सा लगती हैं, अलगाववादी हिंसा को बड़े पैमाने पर भड़काने लगी हैं। जाहिर है कि पाकिस्तान की रणनीति कश्मीर को सुर्खियों में रखने की है। इसके बाद का काम वह अपने दोस्त- संरक्षक अमेरिका पर छोड़ सकता है, जो भारत पर तनाव घटाने के लिए पाकिस्तान के साथ सुलह-संबंधों के सामान्यीकरण के लिए दबाव बढ़ाएगा। जो कुछ बयान हिलरी ने दिए हैं, वह इसी विश्लेषण की पुष्टि करते हैं।

हिलरी इस बात को बखूबी समझती हैं कि उनका काम आसान नहीं। परमाणविक नीति जैसे सामरिक दृष्टि से संवेदनशील मुद्दे के अलावा भी भारत और अमेरिका के बीच अनेक विषय विवादास्पद हैं। आर्थिक मंदी की चपेट में फंसा अमेरिका अब बीपीओ और कॉल सेंटर आदि के मामले में भारत को फायदा दिला अपने घर में बेरोजगारी को बढ़ावा देने का दुस्साहस नहीं कर सकता। पेटेंट और पायरेसी जैसे विषयों में भी अमेरिका का रवैया अर्थशास्त्र की शब्दावली में प्रोटैक्शनिस्ट ही है अर्थात, अपने बाजार के दरवाजे दूसरों के लिए बंद रखने वाला ही है। इससे भी विकट मतभेद मौसम बदलाव वाले राजनय में नजर आ रहे हैं। चीन पर दबाव डालने का हौसला अमेरिका का नहीं हो सकता। इस बारे में भी भारत की ही कोहनी मरोड़ी जा सकती है। इस बात को समझने की जरूरत है कि मुस्कुराती हिलरी ने चहचहाते जयराम रमेश के साथ आईटीसी के ‘हरे’ भवन में एक और तस्वीर क्यों खिचवाई?

हिलरी को इस बात का उतावलापन रहा कि भारत सरकार तत्काल उन जगहों को चिन्हित कर दे, जहां अमेरिका से खरीदे जाने वाले रियेक्टर लगाए जायेंगे। कब्जा सच्चा, दावा झूठा का मर्म अमेरिका भली-भांति समझता है। एक बार यह सौदा हो गया तब फिर किसी दूसरे से खरीदने की हालत भारत की कहां बचेगी? इस कड़वी दवाई पर चीनी की चाशनी चढ़ाने के लिए यह सुनहरा सपना दिखलाया जा रहा है कि भारत के रॉकेटों पर अमेरिकी अपने उपग्रह या अन्य सामग्री भेजने का कार्यक्रम बना सकते हैं। इस खतरे के प्रति सर्तक रहने की जरूरत है कि भले ही यह व्यापार आर्थिक दृष्टि से कितना ही लाभप्रद क्यों न हो यह परमाणविक कार्यक्रम की तरह ही भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को भी अमेरिका का बंधक बना देगा। भारत पाकिस्तान नहीं है। उसे अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए अमेरिकी बैसाखी की जरूरत नहीं। दुनिया के दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश के लिए जिसका कई हज़ार वर्ष का गौरवपूर्ण इतिहास है, स्वाधीनता और स्वायत्तता से बढ़कर और कुछ नहीं हो सकता। आंख मूंदकर ओबामा या हिलरी क्लिंटन के पीछे चलने से पहले कबीर की साखी याद करने की जरूरत है- ‘जो घर फूंके आपनो, चले हमारे साथ!’

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लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं

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