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ब्लॉग वार्ता : दक्षिणपुरी, जो एक शहर है

दिल्ली एक शहर के रूप में कहां-कहां बन रही है, हमारी नजर नहीं पड़ती। दूसरे राज्यों से आए मजदूरों ने शहर के लिए सिर्फ फ्लाईओवर और इमारतें नहीं बनाईं, अपने लिए भी एक शहर बसाया है। बाहर से आए ये मजदूर सिर्फ दिहाड़ी के लिए नहीं आए। घर भी बसाते हैं। हर दिन अपने काम को लेकर सघन रियाज करने वाले इन मजदूरों के किस्सों से दक्षिणपुरी में जिंदगियां आबाद हो रही हैं।

दक्षिण दिल्ली का हिस्सा है दक्षिणपुरी। यहीं से कुछ किलोमीटर दूर जब मेट्रो हादसा हुआ तो केंद्रीय मंत्री को संसद में बयान देना पड़ा। इसलिए नहीं कि मजदूर मारे गए हैं, इसलिए क्योंकि हादसा दक्षिण दिल्ली में हुआ और अपनी उस हैरानी का हल ढूंढ़ने के लिए भी कि मेट्रो में हादसा कैसे हो गया।

ऐसे में एक ब्लॉग है जो पिछले दो साल से मजदूरों से बसते इस शहर की कहानी कहता है। एक शहर है नाम के इस ब्लॉग पर पहुंचने के लिए क्लिक कीजिए http://ek-shehr-hai.blogspot.com।

राकेश खैरालिया और लक्ष्मीचंद कोहली मिलकर कई सैंकड़ों कहानियां जमा कर रहे हैं, जिनमें झांक कर देखिये तो विस्थापित मजदूर किस तरह से अपने को यहां से जोड़ते हुए नजर आते हैं।

दक्षिणपुरी के ये कथाकार एक दिन विराट सिनेमा के पास बनी इंदिरा विराट मार्केट पहुंचते हैं। लिखते हैं कि मुझे ये जानने की एक हुड़क सी लगी कि इस जगह में पहले कौन आया होगा?

आज मैं ऑटो रिक्शा रिपेयर करने वाले अजय कुमार से मिला, जो इस मार्केट में सोलह साल से काम कर रहे हैं। यहां हर दिन पांच सौ से ज्यादा ऑटो रिपेयर होते हैं।

इसके बाद राकेश और लक्ष्मी बताते हैं कि मैंने एक ऑटो बनते हुए देखा। जिसकी लोहे की हड्डियों पर रेक्सिन चढ़ाई जा रही थी। दूसरा आदमी उसके पीछे एक आकर्षक पेंटिंग बना रहा था। एक शख्स ऑटो की हेडलाइट लगा रहा था। इतनी आत्मीयता से किसी के काम को देखने का फन अब खत्म हो गया है।

दक्षिणपुरी की गलियों में घूमते-घूमते राकेश और लक्ष्मी-सुनीता जी के घर पहुंचते हैं। उनके लोकगीतों का रजिस्टर देखने लगते हैं। सुनीता जी लोकगीत लिखती भी हैं और सहेज कर रखती भी हैं। एक गाना निकल आता है- बन्ना, तेरी दादी बड़ी ये होशियार, हमसे हटकर, पलंग से हटकर बिछाली रे अपनी खाट।

सुनीता के खजाने से आगे बढ़ते हुए ब्लॉगर बंधु पहुंचते हैं उस बस स्टॉप के पास, जहां एक सरकारी लाइब्रेरी है, जो पिछले चालीस साल से चल रही है। 25 गज के एक कमरे में चल रहे इस पुस्तकालय में हजार से अधिक किताबें हैं। मातादीन बताते हैं कि इसे पुनर्वास पुस्तकालय कहते हैं। कहीं से उजाड़ कर बसाये गए कॉलोनियों में सरकार पुनर्वास लाइब्रेरी भी बनवाती है। इस लाइब्रेरी में अभी तक बीस हजार लोग दो रुपये देकर कार्ड बनवा चुके हैं। यहां हर दिन 30 लोग किताब लेने आते हैं।

यह ब्लॉग न होता तो पता ही नहीं चलता कि दक्षिणपुरी के बच्चों और मजदूरों में पेट की भूख के अलावा भी कोई और भूख हैं। वो पढ़ना चाहते हैं।

एक कमरे की लाइब्रेरी उन्हीं की बदौलत एक कमरे से निकल कर बीस हजार सदस्यों के कमरों तक पसरी हुई है। हमने कभी मजदूरों की बस्तियों को मजदूरी की दर और हादसों के मुआवजों से आगे समझा ही नहीं।

लाखों मजदूरों की इस बस्ती में कोई सिनेमा हॉल नहीं है। यहीं से थोड़ी दूर पर साकेत में आलीशान सिनेमा हॉल है। पीवीआर कल्चर ने गरीब लोगों को सिनेमा हॉल से दूर कर दिया। लेकिन वे कभी सिनेमा से दूर नहीं हुए। वो आज भी तमाम बोलियों, भाषाओं में बनने वाली फिल्मों के बड़े बाजार हैं। इन्हीं के दम पर भोजपुरी फिल्में हिट हो रही हैं और इनकी सीडी, डीवीडी का कारोबार लाखों करोड़ों में है।

इसी आपाधापी में जनाब अली साहब का किस्सा सामने आता है। अली साहब तमाम लोकल फिल्मों की धुनें उठाते हैं और अपना गाना कम्पोज करते हैं। एक फिल्म बनाने की ख्वाहिश रखते हैं, जिसके लिए ऑडीशन भी कर चुके हैं। कोरियर मैन की नौकरी छोड़ कर शो मैन बनने का ख्वाब।

शहर और कोना, जिनके बीच हमेशा कुछ न कुछ चलता रहता है। कभी कुछ बनाना, कभी कुछ उखाड़ना।

साथ-साथ इनके बीच जो हमेशा चलती रहती है, वो है टाइम। जैसे-जैसे शहर का आकार बढ़ता चला जाता है, उसी में लोग अपनी-अपनी चाहत और मेहनत से अपने लिए कोना बना लेते हैं।

इस ब्लॉग की ये लाइन मुझे काफी पसंद आई। दिल्ली में शहरों में बदलते कोनों को जानने का वक्त आ गया है। दक्षिणपुरी अपने आप में एक शहर बन चुका है।

ravish@ndtv.com
लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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