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स्माइल प्लीज..थैंक यू!

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि इस सुजलां सुफलां भारत भूमि पर अगर कैमरा न होता तो कौन-कौन किसे-किसे बात कहता फिरता? हाय राम, छवियां कैसे निखरतीं? न देखने लायक कुछेक चेहरों के सुबह-सुबह अखबार में दर्शन कैसे होते। खोखली मुस्कुराहटें कैसे देखने को मिलतीं? कुल मिलाकर इस देश के विकास में कैमरे का महत्वपूर्ण योगदान है। यह अलग बात है कि आज तक किसी छायाकार को उच्च पुरस्कार या सम्मान नहीं मिला। क्यों? क्योंकि कैमरा कभी झूठ नहीं बोलता..।

मेरे एक मित्र हैं, जो पूरी तरह इंसान बनने से पहले ही नेता बन गए। इन्हीं मित्र के पिताश्री जब दुनिया से खर्च हुए तो श्मशान पर हजारों की भीड़ थी..जैसी नेताओं के पिता के मरने पर हुआ करती है। फूलों से ढके पिता जी को नेता मुखाग्नि देने जा ही रहे थे कि फोटोग्राफर दिख गया। आदतन भक से डेढ़ इंच मुस्कान तोड़ दी। फोटो में मुस्कराहट देखकर ऐसा लग रहा था जैसे नेता जी गुनगुना रहे हों- ‘आज मेरे बाप की शादी है’। इंसान मर जाता है, फोटो नहीं मरता..बढ़िया आनी चाहिए।

फोटोबाजी कभी-कभी बड़े मार्मिक क्षणों को जन्म देती है। देश में बारिश न होने और अकाल की स्थिति आने से नेता उदास हैं। नेता उदास हैं तो चमचे उदास हैं..सारा माहौल उदास है। फोटोग्राफर खीज रहा है कि चेहरे से यह नकली उदासी उतारो, स्माइल हो तो फोटो खेंचूं। नेता के चेहरे पर उदासी देखकर हंसी आती है। पब्लिक के चेहरे पर उदासी नेचुरल लगती है। उदास ही रहना था तो नेता काहे को हुए? यों भी फोटो शपथ लेते समय की अच्छी लगती है..हारने और इस्तीफा देते क्षणों की नहीं। लोग हनीमून मनाने जाते हैं तो पत्नी के साथ फोटो जरूर खिंचवाते हैं। कभी-कभी ऐतिहासिक स्थलों पर हनीमून मनाते हैं। पत्नी अगर शिलाखंड हुई तो फोटो में यही पता नहीं लगता कि पत्नी कौन सी है और बीजपुर का गोल गुंबद कौन सा है।

सब से सार्थक फोटो वही होती है, जो किसी फिल्म स्टार के साथ खिंचवाई जाए। मेरे शहर में ही अभिषेक-ऐश्वर्या की शूटिंग हुई। हजारों की भीड़। मित्रवर मुरारी लाल भीड़ में घुस गए। फोटो हुई, जिसमें मुरारीलाल कहीं नहीं थे। फिर भी एन्लाजर्मेंट कमरे में टांगा। नीचे लिखा था- ऐश्वर्या और अभिषेक के साथ मुरारीलाल। नीचे नोट लिखा था- कृपया भीड़ में दसवें पैर का मोजा देखिए। यही मुरारीलाल है। चुनांचे ऐ शाह जी, मुस्कुराहट देकर फोटो खिंचवाइए, भले ही पेट खाली हो। इस मुस्कुराहट के पीछे का दर्द न फोटोग्राफर समझ सकता है, न ही उसका कैमरा। मुस्कुराहट ही यादगार बनती है..दर्द नहीं।

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