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महात्मा तैलंग स्वामी

महात्मा तैलंग स्वामी बड़े सिद्ध महात्मा, योगी और तपस्वी थे। अपने आत्मज्ञान से वह, सामने बैठे व्यक्ति के मन के प्रश्न जानकर उत्तर दे देते थे। स्वभाव से बड़े विनम्र और व्यवहार में अत्यंत सरल थे। तैलंग स्वामी का जन्म दक्षिण भारत के विजना-विजियाना जनपद में होलिया ग्राम में नृसिंहधर नामक एक ब्राह्मण के परिवार में हुआ था। उनका नाम तैलंगधर रखा गया। बचपन से ही तैलंगधर ब्राह्मणों, संतों की सेवा करते। उनके माता-पिता ने, उनमें वराग्य के भाव देखकर, उनका विवाह नहीं किया। कुछ समय बाद माता-पिता का देहांत हो गया। तैलंग स्वामी ने उसी श्मशान में बीस वर्ष तक तप किया। इसके बाद वह जीवन भर तप साधना करते रहे।

महात्मा तैलंग स्वामी का विश्वास था- ‘भगवान यह मनुष्य शरीर बनाकर स्वयं इसमें विराजते हैं। मनुष्य जितना संसार के लिए परिश्रम करता है, उसका शतांश भी यदि भगवान के लिए प्रयत्न करे तो वह उसे प्राप्त कर सकता है। तब उस समय संसार में उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं रहेगा।’ वह कहते थे- ‘भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना करनी चाहिए, उनकी भक्ति करनी चाहिए। गुरु द्वारा निर्दिष्ट मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।’

महात्मा तैलंग स्वामी लय योगी, हठ योगी और ज्ञान योगी- सभी कुछ थे। वह अपना जीवन लोककल्याण को समर्पित कर चुके थे। वह जीवन-मुक्त महात्मा थे। उनका कहना था- ‘यदि हम अपने आपको नहीं जान सकते हैं तो ईश्वर को भी नहीं जान सकते हैं। जितने दिन तक हम अपने आप को नहीं जानते हैं, उतने दिन तक चेष्टा करने पर भी ईश्वर को नहीं जान सकते हैं।’

महात्मा तैलंग स्वामी तप, साधना, उपासना पर अधिक बल देते थे। वह इसी को भक्ति कहते थे और इसे ही वह ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बताते थे- ‘यदि ईश्वर को जानने और पाने की इच्छा है, तो उपासना करना आवश्यक है। जिनमें यह इच्छा नहीं है उनके लिए उपासना भी आवश्यक नहीं है। ईश्वर किसी की प्रशंसा के भूखे नहीं हैं।’

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