अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

गंभीरता की दरकार

बच्चों को शिक्षा का अधिकार देने के लिए राजनीतिक दलों की गंभीरता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि जब राज्यसभा में ‘बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा विधेयक, 2008’ पेश हुआ तो मात्र 54 सदस्य मौजूद थे। उम्मीद की जाती है कि देश के भविष्य से जुड़े ऐसे मुद्दों पर राज्यसभा के मनोनीत सदस्य गंभीरता से चर्चा करेंगे। छह से 12 साल तक के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार बनने के लगभग आठ साल बाद जब उसे अमलीजमा पहनाने का वक्त आया तो लगभग बिना किसी बहस के विधेयक पारित हो गया। मात्र चार सांसदों ने विधेयक में मौजूद विषय पर अपनी बात कही। इतने महत्वपूर्ण विधेयक का बिना किसी सार्थक बहस के पारित हो जाना चिंतित करता है। सबको शिक्षा, सबके लिए समान शिक्षा जैसे नारे न जाने कब से उछाले जा रहे हैं, पर आजादी के इतने वर्षो बाद भी प्राथमिक स्तर की शिक्षा में कोई बड़ा बदलाव आया हो, ऐसा नहीं लगता। देश के अधिकतर राज्यों में स्कूली छात्र अपनी कक्षा के अपेक्षित ज्ञान से बहुत पीछे हैं। गांवों और शहरों में सरकारी स्कूलों की जो दशा है, वह किसी से छुपी नहीं है। स्कूल हैं तो कमरे नहीं, स्कूल हैं पर शौचालय व पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं, स्कूल हैं लेकिन ब्लैकबोर्ड व चॉक नहीं, हमारी शिक्षा प्रणाली से जुड़े यह कटु सत्य हैं। सबको पता है शिक्षक हैं जो नियमित रूप से स्कूल नहीं आते या इतने कम हैं कि सब बच्चों पर ठीक से ध्यान नहीं दे पाते। महिला शिक्षकों की कमी और स्कूलों के दूर होने के कारण माता-पिता लड़कियों को स्कूल भेजने से कतराते हैं। एक सरकारी सर्वेक्षण की रिपोर्ट बताती है कि देश भर में करीब 32 हजार स्कूलों में एक भी अध्यापक नहीं है और 1.3 लाख में मात्र एक शिक्षक है। जीडीपी का छह प्रतिशत धन शिक्षा पर खर्च करने का वायदा अभी अधूरा है। ऐसे में शिक्षा अनिवार्य तो हो गई पर बच्चे कैसे पढ़ेंगे? क्या गरीब बच्चों को वैसी शिक्षा मिल पाएगी, जो अमीरों के बच्चों को मिलती है? केवल उच्च शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करने से समस्या का हल नहीं खोज जा सकता। जब तक प्राथमिक स्तर पर नींव मजबूत नहीं होगी, तब तक उच्च शिक्षा हासिल करना भी सपना ही रह जाएगा। प्राथमिक शिक्षा का गिरता स्तर भारत के आर्थिक महाशक्ति बनने के सपने पर प्रश्नचिह्न लगाता है। बच्चों को शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा मुहैया कराए बिना यह संभव नहीं है। उम्मीद है कि लोकसभा में इस विधेयक पर सार्थक बहस होगी और कुछ ठोस नतीजे सामने आएंगे।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:गंभीरता की दरकार