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सजा कहाँ हो रही हैं दलिए एक्ट के मुकदमों में!

कहीं गरीब दलित मारे डर के समझौता कर रहे हैं तो कहीं पुलिस वाले ही इतनी खराब विवेचना कर देते हैं कि अदालत में मामले ठहर न पाएँ। कुछ मामले झूठे भी लिखाए जाते हैं। इस साल के शुरुआती तीन महीनों में दलित एक्ट के तहत आजमगढ रेंज में दर्ज 101 मामलों की पूरी हुई अदालती कार्रवाई में सिर्फ नौ में सजा हुई और बाकी 92 छूट गए।

सरकारी आँकड़े बताते हैं कि यह स्थिति पूरे प्रदेश की है। इस एक्ट के जनवरी से मार्च अंत तक सिर्फ 28 फीसदी मामलों में अदालतों से मुजरिमों को सजा मिली। सबसे खराब हाल आजमगढ़ रेंज का है। गोरखपुर में भी  सिर्फ 14 और आगरा में बीस फीसदी अपराधियों को इस एक्ट के तहत दंड मिल पाया है।

उत्तर प्रदेश में यह स्थिति लगातार बनी हुई है। आधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक बीते तीन महीनों के दौरान भी दर्ज करीब चार सौ मुकदमों में से 136 मामलों के कोर्ट में जाने से पहले ही फाइनल रिपोर्ट लग गई। एक जनवरी से 31 मार्च तक के आँकड़े भी कुछ ऐसी ही स्थिति बयान कर रहे हैं।

मसलन आजमगढ़ में साल की शुरुआत में कुल 1940 केस चल रहे थे। इन तीन महीनों के दौरान 97 नए केस कायम हुए। मार्च के अंत तक यहाँ 2037 केस दर्ज थे। इनमें से सिर्फ 101 में ही फैसला हुआ। नौ मामलों में सजा हुई और 92 आरोपित छूट गए। गोरखपुर में 215 मामलों में सुनवाई पूरी हुई, इसमें से 29 मामलों में सजा हुई और बाकी छूट गए। गोरखपुर के आईजी  रेंज रामदेव का कहना है कि इस एक्ट के ज्यादातर मामलों में समझोता हो जाता है। इसलिए लोग गवाही के दौरान पलट जाते हैं और केस छूट जाते हैं।

हालाँकि एडीजी एंटी करप्शन के पद से हाल ही में रिटायर हुए आईपीएस रामलाल राम कई दूसरे कारणों को भी जिम्मेदार मानते हैं। उनका मानना है कि उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में आज भी दलितों की स्थिति बहुत खराब है। पिटाई होने या अन्य अपराधों की स्थिति में दलित मुकदमा तो लिखाता है पर गाँव की सामाजिक स्थिति में वह इतना समर्थ नहीं है कि वह अपराधियों को सजा दिला पाए।

पुलिस भी प्रभावशाली और पैसे वालों के दबाव में अक्सर समझौता करा देती है या फिर ऐसी चाजर्शीट तैयार करती है जिसमें कई ऐसी गलतियाँ जानबूझ कर छोड़ दी जाती हैं जिससे आरोपितों को फायदा मिल जाता है। पुलिस के एक अन्य अधिकारी का कहना है कि कुछ मामले सिर्फ दुश्मनी में लोगों को फँसाने के लिए ही लिखा दिए जाते हैं। लिहाज ऐसे मामले में कोर्ट में ठहर नहीं पाते।

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