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नेपाली तिब्बतियों की नई सक्रियता का राज

नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में जो अधिकारी तिब्बत डेस्क देख रहे हैं, उनके लिए पिछले सप्ताह मिली यह ख़बर थोड़ी चौंकाने वाली थी कि नेपाल ने तातोपानी, मुस्तांग, किमाथंका, हुम्ला के लिमी और दाचरुला के टिंकर में सशस्त्र प्रहरी (एपीएफ) की तैनाती कर दी है। यह पहले दौर की तैनाती है। दूसरे-तीसरे दौर में चीन सीमा से लगे बाकी इलाकों पर भी सशस्त्र प्रहरी सुरक्षा की कमान संभाल लेंगे, यह तय हो गया है। चीन इसके लिए लगातार दबाव बनाये हुए था। लेकिन माओवादियों के शासन में नहीं रहने पर भी यह निर्णय हुआ है, यही इस ख़बर का चौंकाने वाला पहलू हैं।
उईगुर मुसलमानों से जूझ रहा चीन, नेपाल में तिब्बतियों की मुश्कें क्यों कसना चाहता है, इस प्रश्न का माकूल उत्तर सीआईए की भावी योजनाओं की झलक देखने पर मिल जाता है। यों तो अमेरिकी खुफिया एजेंसी की हर कार्रवाई को ‘पोस्ट 9/11’ के चश्मे से आंका जाता है, पर ‘एएफआई रिसर्च’ से जुड़े खुफिया मामलों के विशेषज्ञ रिचर्ड एम़ बेनेट का मानना है कि लांगले स्थित सीआईए मुख्यालय में उन पुरानी फाइलों पर से धूल झड़ा गया है, जिनके ऑपरेशन बंद कर दिये गये थे। इन्हीं में से एक ऑपरेशन ‘सीटी सर्कस’ था। सीआईए ने 1956 से 74 तक जो खेल पश्चिम नेपाल के तिब्बत बहुल इलाके में किया, वह किसी सर्कस से कम नहीं था।
यह ‘सर्कस’ फिर से शुरू है। पिछले साल से कोई चार बार काठमांडू स्थित अमेरिकी दूत नैंसी पॉवेल व पश्चिमी देशों के दूत मुस्तांग, जोमसोम और मारफा जैसे इलाक़ों के चक्कर लगा चुके हैं। चौकसी के लिए चीनी दूत छिउ क्कोहोंग भी उधर कई बार गये।
‘खंफा युद्घ’ में 30 हजार के आस-पास तिब्बती मारे गये थे। मुस्तांग के इलाके में जो तिब्बती जिंदा बच गये, वे बेखौफ बताते हैं कि सीआईए ने अपने स्वार्थ के लिए उनका इस्तेमाल किया था। तिब्बत के खाम से लेकर नेपाल के मुस्तांग तक पसरे खंफा कबीले के योद्धाओं को कब सीआईए ने शीशे में उतारा, इसकी अलग कहानी है। लेकिन सीआईए ने तय कर लिया था कि खंफा योद्धाओं के बहाने चीन को परेशान करना है।

इस पर फिर से सोचने की जरूरत है कि 1959 में एक लाख अनुयायियों के साथ दलाई लामा भारत आते हैं, इसके कोई तीन साल पहले से ही कोलराडो के कैंप हाले में सीआईए के वरिष्ठ अधिकारी रोजर ई. मैकार्थी ने खंफा लड़ाकों के जत्थों को प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया था। ‘चूसी गांद्रूक’ नामक दो हजार की संख्या वाली खंफा आर्मी के जनक रोजर ई मैकार्थी थे। ‘चूसी गांद्रूक’ के नेता आंद्रूग गोंपो ताशी किसी भी हाल में मुस्तांग को स्वतंत्र राज्य बनाये रखना चाहते थे। सीआईए ने इसी का फायदा उठाया था। तो क्या इसका अर्थ यह लगाया जाना चाहिये कि तिब्बत में उत्पात के पीछे अकेले चीन नहीं, अमेरिका भी था? सीआईए में रोजर ई. मैकार्थी की हैसियत का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि खंफा युद्ध के बाद वे वियतनाम और लाओस में इसी तरह के ऑपरेशन की कमान संभालने लगे थे। ‘सीआईए सीक्रेट वार’ लिखनेवाले केनेथ कॉनब्वाय और जेम्स मोरिसन ने दावा किया कि 1962 के युद्ध के बाद भारतीय खुफिया सेवा के अधिकारी सीआईए के ज्यादा क़रीब आये। ‘एविएशन रिसर्च सेंटर’ और ‘स्पेशल फ्रंटियर फोर्स’ जैसा साझा खुफिया सहकार 1972 तक चला, जब तक कि वाशिंगटन-नई दिल्ली के कूटनीतिक आंकड़े 36 के नहीं हो गये। 1972 में तब के अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के पेइचिंग जाते ही पूरा पासा पलट गया। चीनी दबाव की ही वजह से 1974 में शाही नेपाल सेना ने खंफा लड़ाकों को निशस्त्र करना शुरू किया। दोती के पास खंफा कमांडर वांगदी की मौत के बाद सारा खेल समाप्त हो चुका था। तिब्बतन टास्क फोर्स के पूर्व प्रमुख जॉन केनेथ क्राउस ने अपनी पुस्तक ‘ऑर्फन ऑफ द कोल्ड वार’, में स्वीकार किया कि यह पूरा ऑपरेशन अमेरिकी सरकार की शह पर संचालित किया गया था।
इन घटनाओं को बीते 35 साल हो चुके हैं। साढ़े तीन दशक में तिब्बतियों का कोई क्रांतिकारी गुट खड़ा नहीं हो सका है, यह तो स्पष्ट है। लेकिन नेपाल में निर्वासित कोई 30 हजार तिब्बती थक-हार गये हैं, या फिर अमेरिका पर से उनका भरोसा एकदम से उठ गया है, ऐसी बात भी नहीं है। अमेरिकी दूत नैंसी पावेल का जिस तरह से नेपाल स्थित तिब्बती नेताओं से मिलना-जुलना है, उससे साफ लगता है कि दोनों का एक दूसरे के बिना गुजारा नहीं होने वाला। फिर भी पिछले दो वर्षो से दर्जन भर ऐसे मौके आये, जब तिब्बती उग्र हुए और बड़ी संख्या में उनकी धर-पकड़ हुई।

नेपाल सरकार ‘वन चाइना पॉलिसी’ की पक्षधर है, पर पिछले सप्ताह जिस तरह से आधा दर्जन नेपाली सांसद दलाई लामा से धर्मशाला जाकर मिले, उसे लेकर लगता है कि खंफा युद्ध की तरह अंदर ही अंदर कुछ पक रहा है। गुजरे 12 जुलाई को नेपाल के मेट्रो शहर वीरगंज में मधेसी जनाधिकार फोरम मधेस के नेता भाग्यनाथ प्रसाद गुप्ता तिब्बतियों पर हो रहे ज़ुल्मों-सितम के सवाल पर एक बड़ी सभा कर बैठे। तय यह हुआ कि उनका फोरम तिब्बतियों को हर तरह का समर्थन देगा। मधेस के झंडाबरदार भाग्यनाथ गुप्ता पहाड़ में बसे तिब्बतियों को मदद देना क्यों चाहते हैं? यह भी एक बड़ा सवाल है। इससे एक संदेश तो यह भी जाता है कि तिब्बती तराई के नेताओं का भरोसा चाहते हैं, ताकि माओवादियों से कुछ हद तक मोर्चा लिया जा सके।

नेपाल उन्हीं तिब्बतियों को आधिकारिक रूप से अपने यहां बसने और रोजगार की अनुमति दे रहा है, जो 1989 से पहले तिब्बत से वहां आये। नेपाल में इसी शरणार्थी क़ानून के आधार पर सख्ती हो रही है, जिससे तिब्बत से आने वाले शरणार्थियों संख्या में निरंतर गिरावट आई है। जो तिब्बती नेपाल आ भी रहे हैं, उन्हें भारत का रास्ता दिखा दिया जाता है। भारत में 1980 के बाद आये तिब्बतियों के प्रवास और रोज़गार पर कई तरह के प्रतिबंध हैं, लेकिन ये कागज़ों तक ही सीमित हैं। भारत सरकार भी मानती है कि 1986 से 96 के बीच 25 हजार तिब्बती इस देश में आये। बाद के 15 वर्षो में कितने तिब्बती भारत में खप गये, इस पर भारत सरकार चुप ही है। इस चुप्पी के पीछे काठमांडू-दिल्ली का अमेरिकी दूतावास, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी आयोग, सीआईए और मानवाधिकार का कारोबार चलाने वाली संस्थाओं का क्या रोल रहा है, इसे खंगालने की जरूरत है। सीआईए के ताज़ा खेल में भारत तटस्थ रहे तो ज्यादा सही रहेगा। क्योंकि अमेरिका हिमालय में अर्से से एक अड्डा चाह रहा है!

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लेखक ईयू-एशिया न्यूज़ के
 नई दिल्ली स्थित संपादक हैं

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