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समाज : एड्स पीड़ितों को अछूत न बनाएं

एक गर्भवती महिला को मजबूरन सरकारी अस्पताल के द्वार पर बच्चे को जन्म देना पड़ा। आरोप है कि एचआईवी से पीड़ित होने के कारण उत्तर प्रदेश के अंबेडकर जिले के सरकारी अस्पताल ने महिला का इलाज करने से इंकार कर दिया। रिपोर्ट के अनुसार महात्मा ज्योतिबा फूले जिला अस्पताल के डॉक्टरों और स्टाफ ने महिला के एचआईवी पॉजिटिव होने के कारण उसका इलाज करने से मना कर दिया और उसके परिवार को उसे दूसरी जगह ले जने को कहा। दूसरे अस्पताल के लिए जाते हुए महिला ने रास्ते में सरकारी अस्पताल के द्वार पर ही बच्चे को जन्म दे दिया।

जामनगर (गुजरात) के सरकारी अस्पताल में तो हद हो गई। एक गर्भवती महिला के एचआईवी पॉजिटिव पाए जाने पर डाक्टरों ने उसके माथे पर एचआईवी पॉजिटिव लिखी पट्टी चिपका दी और उसे अस्पताल का चक्कर लगाने पर मजबूर किया। साथ ही भाजपा शासित इस राज्य के गुरु गोविंद सिंह अस्पताल में एचआईवी पॉजिटिव उस महिला का प्रभारी डॉक्टर तथा एक अन्य डॉक्टर ने इलाज करने से इंकार कर दिया। बाद में एक नर्स की सहायता से महिला के माथे पर एचआईवी पॉजिटिव की पट्टी चिपका दी गई। हैरानी की बात है कि एक तरफ सरकार इस बात का जमकर प्रचार कर रही है कि एड्स कोई छूत की बीमारी नहीं है, जबकि दूसरी तरफ इस तथ्य से वाकिफ डॉक्टर ही रोगियों को दुत्कार रहे हैं। ऐसे में इस बीमारी को लेकर आम आदमी के मन में व्याप्त भय कैसे मिटेगा? अब यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि जिस रोगी को एचआईवी हो उसका चुंबन लेने, गले लगने, हाथ मिलाने, उसके छींकने या उसके द्वारा प्रयोग की जाने वाली वस्तुओं को छूने से संक्रमण नहीं होता है। वैसे कानून भी इस बात की इजाजत नहीं देता कि एचआईवी पॉजिटिव मरीज के साथ किसी भी तरह का लिंग भेद किया जाए या उससे संबंधित जानकारी को सरेआम उजागर किया जए। कानून में ऐसे रोगी को सामान्य रोगियों की तरह परामर्श व इलाज की सुविधाएं देना अनिवार्य बनाया गया है। मरीज से संबंधित जानकारी को हर हाल में गोपनीय रखने की बात भी कही गई है। आम धारणा है कि एड्स से भयानक बीमारी और कोई नहीं है, हालांकि सच इससे उलट है। 21वीं सदी में मनुष्य जिस तरह की घातक बीमारियों की चपेट में आ रहा है, एड्स उन्हीं में से एक है। इस रोग से जीवन को खतरा तो है, लेकिन निरंतर इलाज से इसे नियंत्रित भी किया ज सकता है। जीवन शैली में थोड़े से परिवर्तन और खानपान व दवाओं के नियमित सेवन से एचआईवी एड्स पर काबू पाया ज सकता है। एचआईवी एक ऐसा विषाणु है, जो मानव शरीर की प्रतिरोध क्षमता को कम करता है। विषाणु की चपेट में आने के बाद औसतन 10-12 सालों में एड्स का असर दिखाई देता है। समय पर इलाज शुरू कर देने से इस बीमारी को बढ़ने से रोका ज सकता है। देश में महिलाओं में एचआईवी संक्रमण बढ़ रहा है। इसका कारण सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा से काफी हद तक जुड़ा है। भारत में 52 लाख एचआईवी पॉजिटिव रोगियों में से करीब 40 प्रतिशत महिलाएं हैं। अधिकांश प्रभावित महिलाएं अपने पति या साथी के कारण इस बीमारी का शिकार बनती हैं। आंकड़े गवाह हैं कि 80 प्रतिशत महिलाओं को यह रोग पति या साथी से मिला है। आम धारणा है कि एचआईवी एड्स से पीड़ित ज्यादातर महिलाएं सेक्स वर्कर हैं, जबकि स्थिति इसके उलट है। पीड़ित 20 लाख महिलाओं में से केवल एक प्रतिशत ही सेक्स वर्कर हैं। अनुमान है कि भारत में एचआईवी पॉजिटिव माताओं से जन्मे 30 प्रतिशत बच्चों पर इसके संक्रमण का असर होता है। ये असर तीन तरह से हो सकता है-कोख में, जन्म के समय और स्तनपान कराने से। रक्त, वीर्य, योनि स्राव और स्तनपान से एचआईवी पीड़ित व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में संक्रमण आता है।

संभवत: परिवार और समाज का नकारात्मक रवैया देखकर ही महिलाएं इस रोग को छुपाती हैं। आमतौर पर रोग का पता चलने पर परिवार, पति तथा समाज उन्हें दुत्कार देता है और उनका कारगर इलाज भी नहीं कराया जाता। कुछ डॉक्टरों और अस्पतालों के अमानवीय रवये ने महिलाओं के मन में इस रोग को लेकर चिंता और डर गहरा रहा है। परिवार और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी तथा पति या किसी परिवार पर आर्थिक रूप से निर्भरता भी उन्हें इलाज कराने से रोकती है। एचआईवी पीड़ित महिलाओं व बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए एचआईवी एड्स बिल की मांग उठ रही है। सरकार ने इस बिल को पास कराने का आश्वासन भी दिया है। बिल पास होने से संभवत: पीड़ित महिलाओं के जीवन में सुधार हो और लोगों का उनके प्रति नजरिया बदले।

sushmavarma@hindustantimes.com
लेखिका हिन्दुस्तान में एसोशिएट एडीटर हैं

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