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उनकी प्रार्थना

‘हमने तुम्हारे अस्तित्व से इंकार नहीं किया है, प्रभु। इसलिये तुम आओ और हमारी रक्षा करो। हमें स्वीकृति दो। हमें सारे संसार के आगे जीने का अधिकार दो, भगवान। हमारे अस्तित्व को स्वीकार करो।’ यह प्रार्थना है रेडक्लिफ हॉल के उपन्यास ‘दे वेल ऑफ लोनलीनेस’ के एक पात्र स्टीफन गार्डन की। स्टीफन गार्डन ब्रिटिश सामंत परिवार में पली-बढ़ी एक लड़की है, जो लेस्बियन है। वह अपने अस्तित्व, अपने प्रेम से लगातार जूझती है और प्रभु से अपनी रक्षा की गुहार लगाती है। ईश्वर से गुहार लगाना आज भी समलैंगिकों की नियति है। धर्म और समाज दोनों के पास उनके लिए अस्वीकार्यता ही है। यह प्रश्न लगातार उठता आया है कि क्या समलैंगिक भी ईश्वर के उतने ही करीब हैं जितने अन्य। यकीनन इसका जवाब ‘हां’ होना चाहिए। ईश्वर के दरबार में सभी की प्रार्थनाएं पहुंचती हैं और वह सभी पर विचार करता है। आखिर जो भी रचा है उसी ने रचा है। एकलिंगी, समलिंगी, उभयलिंगी सभी उनकी ही संतानें हैं। ईश्वर ने यदि कुछ लोगों को सभी इंद्रियों से सुसज्जित रखा है किंतु लैंगिक विभिन्नता दी है तो इसके पीछे प्रकृति का जरूर कोई जटिल लॉजिक होगी। ग्वेद में भी कहा गया है-‘विकृति इवम प्रकृति’ अर्थात जिसे विकृति समझा जाता है वह भी प्रकृति ही है। फिर केवल मनुष्य ही नहीं पेंगुइन, डॉल्फिन, चिंपाजी, सील जैसे जीवों में भी समलैंगिकता पाई जाती है।

हम नैतिकता के नाम पर किसी समुदाय को उसके ईश्वरीय हक से बेदखल नहीं कर सकते। मानवाधिकर क्या है? वह ईश्वरीय हक का ही एक हिस्सा भर है। धर्म और ईश्वरीय कानून में कई स्तरों पर अंतर हो सकता है। धर्म में सांस्कृतिक मिथकीयता का घालमेल हो सकता है, ईश्वरीय कानून में नहीं। धर्म नई चीजों को लेकर उत्साहजनक रवैया नहीं रखता है लेकिन ऐसा ईश्वर के बारे में नहीं कहा जा सकता। वह सबसे बड़ा मनोविज्ञानी भी है और जीवविज्ञानी भी। जब वह अपने किसी रचना के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार नहीं करता तो फिर हम-आप कौन होते हैं ऐसा करने वाले। 

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  • Web Title:उनकी प्रार्थना