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चिट्ठियां संभालना मुश्किल हो जाता था

चिट्ठियां संभालना मुश्किल हो जाता था

मुझे बड़की का कैरेक्टर बहुत पसंद था

स्मृति ईरानी
‘हम लोग’ की बहुत सी कडि़यां मैंने तब देखीं, जब यह सोनी टीवी पर दोबारा प्रसारित किया गया था। मुझमें इसमें बड़की  का कैरेक्टर बहुत पसंद था। हमेशा दबी-सहमी रहने वाली लड़की, जिसे पिता से लेकर छोटी बहन तक से तिरस्कार झेलना पड़ता है। फिर भी वह अपनी पहचान खुद बनाती है। हमारे अपने जानने वाले कई परिवारों की लडकियों में बड़की के कैरेक्टर के बहुत से शेड्स थे। मैंने खुद एक नए शहर में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष किया है। मंझली जैसे सपने देखती है, मेरी कई सहेलियां ऐसे ही सपने देखती थीं। ऐसे ही दादाजी का किरदार.. हमारे दादा जी भी उन्हीं की तरह हमारा मागदर्शन किया करते थे। उन्हीं की तरह सुलझे हुए शख्स थे। ऐसे कई दूसरे किरदार भी थे। काम्या जैसी कई बिंदास लडम्कियों को मैं जानती थी। मेरी मां इसे देखने को बहुत उत्सुक रहती थीं। कई बार सीरियल के किरदारों पर घर में बहस भी हो जाती थी। इतना पसंद किया जाता था कि आस-पड़ोस वाले एक साथ जमा होकर इसे देखते थे। काम्या के नाम पर हमारे एक जानने वाले ने अपनी बच्ची का नाम काम्या भी रखा था।

टीवी सीरियल अक्सर लोगों को इतना प्रभावित करते हैं कि वे असली और नकली में फर्क नहीं कर पाते। ‘हम लोग’ से ही यह शुरुआत हुई थी। दरअसल टीवी किसी भी कलाकार को आपके परिवार का हिस्सा बना देता है। बड़की, मंझली और छुटकी, ये तीनों हमें अपने परिवार का सदस्य लगती थीं।सीरियल की कहानी जैसे-जैसे आगे बढती थी, उन किरदारों को लेकर हम पजेसिव होते जाते थे। बड़की जब डॉ. अश्विनी के प्रेम से इनकार करती है, तो दर्शकों को बुरा लगता था। मंझली जब बिना सोचे समझे मुंबई के सपने देखती है और अपनी बड़ी बहन को कमेंट करती है, तो दर्शकों को गुस्सा आता था। छुटकी जब लेडी डॉक्टर- नाम याद नहीं- के घर चली जाती है तो दर्शक तसल्ली करते हैं कि अब इसका जीवन संवर जाएगा।

‘हम लोग’ टीवी पर धारावाहिकों की शुरुआत थी। तब डेली सोप नहीं हुआ करते थे, लेकिन दूरदर्शन की पहुंच ने इसे हर शहर, हर कस्बे तक पहुंचाया था। ‘हम लोग’ छोटे परदे का एपिक (महाकाव्य) था। हर उम्र के, हर तरह के इंटरेस्ट वाले दर्शकों का पसंदीदा।

दर्शकों की वजह से हम लोग, हम लोग बन पाए
 अभिनव चतुर्वेदी

‘हम लोग’ विदेश तक में सराहा गया। इसका सारा श्रेय मनोहर श्याम जोशी, जिन्होंने इसे अपनी जादुई कलम से लिखा, निर्देशक पी वासुदेव, जो कि मल्टी कैमरा के मास्टर थे, आईएंडबी सचिव एसएस गिल साहब और सतीश गर्ग, जो कि दूरदर्शन के ईपी थे, और सीनियर कलाकारों को जाता है। हम नवोदित कलाकारों का सौभाग्य था कि यह अद्भुत समागम बना। चूंकि यह लोगों को अपना दर्पण लगा, इसीलिए लोगों ने इसे पसंद किया। वह दर्शक ही थे, कि हम लोग, हम लोग बन पाए। इसकी जीती जागती मिसाल है वह शोध कार्य जो ‘हम लोग’ पर अमेरिका में हुआ। डॉ. अरविंद सिंघल और प्रोफेसर इवरेट रॉजर्स ने अपनी किताब ‘इंटरटेनमेंट एजुकेशन- अ कम्युनिकेशन स्ट्रैटेजी फॉर सोशल चेंज’ में इस पर एक अध्याय लिखा है।

प्रशंसक अपने काम छोड़कर हमें देखने अपने टीवी सेट्स के आगे बैठ जाते थे। मेरे पास अब भी एक महिला प्रशंसक का वह पत्र है, जो उसने सनमाइका पर लिखकर मुझे भेजा था। हाल ही में मेरे एक प्रशंसक ने अपनी ऑटोग्राफ बुक मुझ दिखाई, जिसमें मेरे हस्ताक्षर थे। मुजे धारावाहिक के कई सीन्स याद हैं। एक बार विनोद जी ने मुजे शूटिंग के दौरान जोर से थप्पड़ मारा। मेरे मुंह से खून आ गया। विनोद जी ने खुद कट बोला, और फिर शूटिंग आधे घंटे रोक दी गई। विनोद जी ने मुझे अपनी गोद में लिटाया और बहुत प्यार किया। यह दुखद है कि इसमें हमारे दादाजी बने लहरी सिंह जी अब हमारे बीच नहीं। उनसे हमें हमेशा वही प्यार मिलता था।

‘हम लोग’ से प्रभावित हैं ‘बालिका वधू’ के स्लोगन
पुर्णेन्दु शेखर
"हम लोग’ जब प्रसारित होता था, तब हमारे घर में टीवी नहीं था। तो, हम कभी अपने दोस्तों के घर जाकर टीवी देखा करते थे। मैंने उसकी सभी कडि़यां लगातार नहीं देखीं, लेकिन तब भी वह हम लोगों को बहुत अच्छा लगता था। बसेसर राम, बड़की, दादाजी, ये सभी किरदार रियल लाइफ से जुड़ते थे। हमारे समाज का मध्यम वर्ग का आइना था वह धारावाहिक। जिस परिवार में अभावों में, थोड़े से पैसों से खुशियां आती थीं। यह छोटे परदे का पहला धारावाहिक था, और इस मायने में भी पहला धारावाहिक था, जिसने आम लोगों को छुआ था। तब साधन सीमित थे, सीमित बजट होता था। तकनीक का भी उतना विकास नहीं हुआ था। लेकिन यह लेखक की सोच थी, खूबसूरत पटकथा थी, मजबूत पृष्ठभूमि थी कि धारावाहिक ने दर्शकों को इस तरह बांध लिया था। यह अपने समय का सफलतम धारावाहिक था। हम जैसे लोग अगर यथार्थ के इतने नजदीक रह पाते हैं तो इसकी वजह भी हम लोग जैसे धारावाहिक हैं।
वैसे मेरे लेखन की प्रेरणा मेरे पिताजी मेघराज श्रीमाली हैं। हालांकि ‘बालिका वधू’ का लेखक-पटकथाकार मैं हूं, लेकिन सीरियल की हर कड़ी के आखिर के स्लोगन वही लिखते हैं। यहां मैं यह जरूर कहूंगा कि इस स्लोगन की प्रेरणा मुझे ‘हम लोग’ से ही मिली है। ‘हम लोग’ के आखिर में अशोक कुमार जी धारावाहिक के बारे में बताते-बताते, कोई न कोई संदेश जरूर देते थे। इन्हीं संदेशों को हमने स्लोगन का रूप दे दिया है।

लोअर मिडिल क्लास का एक लाइव प्रेजेंटेशन
स्क्रिप्ट के लिहाज से ‘हम लोग’ एक बेहतरीन सीरियल था। लोअर मिडिल क्लास का एक लाइव प्रेजेंटेशन। हिंदी में अब तक ऐसा कोई सीरियल नहीं लिखा गया। इसका कैरेक्टेराइजेशन गजब का था। खासकर, दादी का कैरेक्टर। हमारे यहां ऐसे कैरेक्टर्स खूब मिल जाते हैं। इसके अलावा स्टोरी नरेशन भी बहुत अच्छा था। अगर आप चाहें तो इस कहानी के कई कैरेक्टर्स को लेकर अलग-अलग कहानियां भी बना सकते हैं। उस समय के सोशल-इकोनॉमिकल बैकग्राउंड पर बेस्ड होने की वजह से इसे लोकप्रियता भी खूब मिली थी। अब शायद लोग टेलीविजन पर अपर मिडिल क्लास को देखने के इतने यूज टू हो गए हैं कि उन्हें ऐसे कैरेक्टर्स आउट ऑफ द वल्र्ड लगें।

तब मकसद मुनाफा नहीं था
महेश भट्ट
जब तक टीवी का मतलब, दूरदर्शन था, तब तक सोद्देश्य कार्यक्रमों के लिए छोटे परदे पर पर्याप्त गुंजाइश थी। सरकार का मकसद उससे सिर्फ पैसे कमाना नहीं था। यह देश के कोने-कोने में सांस्कृतिक-सामाजिक चेतना फैलाने का काम करता था। ‘हम लोग३ उसी दौर का था। सूचना प्रसारण मंत्रालय वसंत साठे के मातहत था। वह खुद भी इन सब बातों को लेकर पहल करते थे। ‘हम लोग’ की शुरुआत भले ही सामाजिक संदेश के साथ हुई थी, लेकिन उसका कथा सूत्र ऐसा था कि लोगों को संदेश से ज्यादा कहानी में मजा आने लगा। धीरे-धीरे लोगों को टीवी की आदत सी लग गई। इसी आदत का परिणाम है कि आज छोटा परदा इतना स्ट्रांग मीडियम बन गया है। इसके बावजूद यह दुखद है कि इसका जैसा इस्तेमाल किया जाना चाहिए नहीं हो रहा। प्राइवेट चैनलों का मकसद मुनाफा कमाना है। इसीलिए एक बार किसी विषय पर एक चैनल ने एक सीरियल बनाया तो दूसरे भी उसकी नकल में लग जाते हैं। कुछ समय पहले तक अगर सास बहुओं की हुकूमत थी, तो आज बेटियां छाई हैं। कहानियों के मोड़ भले अलग हों लेकिन सेटअप और कलाकारों के गेटअप लगभग एक से हैं। मेरा मानना है कि कहानी कोई भी हो, अगर ऑडियंस को उसमें अपना अक्स नजर आएगा तभी वह उसे मंजूर करेगी। जैसे फिल्में पसंद-नापसंद की जाती हैं, उसी तरह सीरियल भी। हां, टीवी के दर्शक अपनी च्वाइस बताने को आजाद नहीं। वहां सब कुछ विज्ञापनों से तय होता है। फिल्मों के मामले में ऑडियंस आजाद है। नकारना चाहे तो बॉक्स ऑफिस के नतीजे बता देते हैं। जहां तक ‘हम लोग’ की बात है, उस दौर में उसने कामयाबी के झंडे गाड़े थे। दूरदर्शन को फिर ऐसे ही कार्यक्रमों को बनाने की कोशिश करनी चाहिए। कथा सूत्र ऐसा था कि लोगों को संदेश से ज्यादा कहानी में मजा आने लगा।

अनुपम जोशी
‘हम लोग’ टेलीविजन की दुनिया का माइलस्टोन है। पिताजी ने उसे लिखते समय देश के आम आदमी को नजर में रखा था। उनकी नजर बहुत पैनी थी। पारिवारिक संबंधों पर उनकी ऐसी पकड़ थी जो आम तौर पर पुरुषों में नहीं होती। पर पिताजी एकदम अलग समझ वाले थे। जैसा कि ज्यादातर लोग जानते हैं, लैटिनी सोप ऑपेराज से प्रभावित होकर ‘हम लोग’ की परिकल्पना की गई थी। इस शैली के सोप ऑपेराज संदेशपरक होते थे, और उनका उद्देश्य सामाजिक बदलाव होता था। इसी से प्रभावित होकर दूरदर्शन के आला अधिकारी अपने यहां भी कोई प्रोडक्शन चाहते थे। फिर कैसे-कैसे इस धारावाहिक की योजना बनी, कैसे बैठकें हुईं और बडम्े अधिकारी विदेशी दौरे पर गए- यह सभी जानते हैं। बाद में, पिताजी पर इस धारावाहिक को लिखने का जिम्मा आया। उसके बाद, जो हुआ, वह सब इतिहास है।

पिताजी अपनी लेखन प्रक्रिया में परिवार को अक्सर शामिल नहीं करते थे। हां, मेरी मां जो उस समय एलएसआर में प्राध्यापिका थीं, से जरूर वह शेयर किया करते थे। मैं तब 11 वीं में पढ रहा था, मेरे दोनों छोटे भाई और छोटी क्लासेस में थे, तो हम बहुत ज्यादा बड़ी भूमिका में नहीं थे। हां, मुझे वह कई बार स्क्रिप्ट का प्रूफ देखने के लिए कहते थे। उनमें एक खास बात थी। वह अपने कमरे में बंद हो जाते थे और फिर उनका लेखन शुरू होता था। वह ऑल इंडिया रेडियो के न्यूजरूम में काम कर चुके थे इसलिए कभी हाथ से नहीं लिखते थे। वह धाराप्रवाह बोलते थे और एक टाइपिस्ट टाइप करता जाता था।

पिताजी की एक और खासियत थी। अक्सर कहानी, पटकथा और संवाद, फिल्मों और धारावाहिकों में भी, अलग-अलग लोग लिखा करते हैं। लेकिन पिताजी यह तीनों काम एक साथ करते थे। ‘हम लोग’ के लिए भी उन्होंने यह पूरा दायित्व उठाया था। पूरा दृश्य उनके जेहन में मानो उतर आता था। इसके बाद वह बोलते जाते थे। दरअसल अपनी युवावस्था में वह मुंबई में ह्रषीकेश मुखर्जी और उनके भाई की मंडली में रह चुके थे। ह्रषीकेश मुखर्जी के भाई में यह कला थी कि दृश्य दर दृश्य उनके जेहन में बने रहते थे। उन्हीं की तरह, पिताजी की कल्पना में भी तमाम दृश्य आकार लेते जाते थे। एक बार कागज पर उतारने के बाद वह उसमें संशोधन करते जाते थे- कई बार तो डेडलाइन खत्म होने के कुछ वक्त पहले तक भी।

‘हम लोग’ के कई कलाकार मेरे साथ मॉडर्न स्कूल में पढ़ाकरते थे। अभिनव चतुर्वेदी, काम्या मल्होत्रा, विनोद नागपाल (बसेसर) की बेटी तन्वी। इनमें अभिनव और काम्या हमसे कुछ साल सीनियर थे। अभिनव की एक आदत थी, किसी की भी नकल उतारने की। स्कूल में अक्सर वह यह किया करते थे। हमने जब अभिनव की इस कला के बारे में बताया तो यह तय किया गया कि उनके किरदार नन्हे को कुछ इसी तरह विकसित किया जाए। नन्हे धारावाहिक की कई कडि़यों में नकल करता हुआ नजर आता था। ‘हम लोग’ की लोकप्रियता का अंदाजा दर्शकों की प्रतिक्रियाओं से लगाया जा सकता है। इतनी चिट्ठियां आती थीं कि उन्हें संभालना मुश्किल हो रहा था।

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