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चंद्र अभियान की कामयाबी के 40 साल

चांद पर पहली बार आज से ठीक 40 साल पहले मानव के कदम पड़े थे। इस चंद्र यात्रा को लेकर पूरी दुनिया में अपार उत्सुकता थी। अपोलो-11 के तीन अंतरिक्ष यात्रियों ने तब अपने अनुभव सारी दुनिया से बांटे थे। उन्होंने जो कुछ चांद पर देखा, महसूस किया और अपने मिशन से जो खोजपूर्ण जानकारी एकत्र की, वह आज भी लोगों के सतत कौतुहल और चंद्र मोह के साथ उनकी सोच और कल्पनाओं में विचरण करती है। इसी से जुड़े कुछ यादगार प्रसंग:

अपोलो का निर्माण
अपोलो 11 की कामयाबी के बाद चांद की यात्रा करने वाले तीनों यात्रियों के विचार प्रसारित किए गए थे। बज एल्ड्रिन ने न केवल तीनों यात्रियों के सफर पर बात की थी, बल्कि अज्ञात की तलाश में युगों से संघर्षरत मानव जति के कौतुहल के बारे में भी चर्चा की। माइक कॉलिन्स ने सेटर्न फाइव की जटिलता और उसके निर्माण में बहे पसीने और कठोर परिश्रम पर विचार रखे। वहीं नील आर्मस्ट्रांग ने अमेरिकियों को उस यात्रा को सफल बनाने के लिए अपनी एकजुटता दिखाने पर धन्यवाद किया।

इसके अतिरिक्त, नासा के अनुसार चंद्र मिशन को सफल बनाने के लिए करीब चार लाख इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और तकनीशियनों ने काम किया था - इनके अतिरिक्त बड़ी संख्या में मशीनें और सहायक उपकरण भी इस्तेमाल किए गए थे। इन लोगों में से कई ने पहले एयरोस्पेस इंडस्ट्री के लिए काम नहीं किया था और न ही उन्होंने अंतरिक्ष में मनुष्य को ले जाने वाली मशीनों पर काम ही किया था। अलग कंपनियों से जुड़े इन तकनीकी विशेषज्ञों ने जब अपोलो मिशन पर काम करना शुरू किया तो यह अनुभव स्वयं उनके पेशे के लिए ही बहुत फायदेमंद साबित हुआ था। अपोलो पांच कंपनियों द्वारा बनाया गया यान था जिसे कई अड़चनों के बाद अंजाम तक पहुंचाया गया था।

अपोलो यान के लाखों पुज्रो को बनाने की जिम्मेदारी अपोलो के प्रोग्राम मैनेजर जॉर्ज मुलर पर आ पड़ी थी। मुलर ने तीनों अंतरिक्ष यात्रियों से अनुरोध किया था कि वह स्वयं आकर फैक्टरी में बन रहे कलपुर्जों का मुआयना करें। दरअसल, इसके पीछे मुलर का मंतव्य था कि वह हरेक फैक्टरी कर्मी को बिना कहे बता देना चाहते थे कि उनकी जरा सी चूक से उन व्यक्तियों की जान जा सकती है जिन्हें वह मिल चुके थे और उनकी यह विधि सफल रही थी।

अंतरिक्ष की दौड़
यूरी गगारिन ने 1961 में पृथ्वी का चक्कर 92 मिनट में लगाया था। उन्होंने डेढ़ घंटे में 24,000 मील की यात्रा पूरी की थी। गगारिन की इस सफलता ने सोवियत संघ की लंबे समय से चली आ रही बादशाहत को चुनौती दी। उन्होंने ऐसा काम किया था, जिसकी इससे पहले कल्पना भी नहीं की गई थी। अपोलो लैंडिंग की घटना किसी बड़े रोमांच से कम नहीं थी।

उस दौरान अंतरिक्ष में पहले पहुंचने की होड़ लगी थी। ऐसा लग रहा था कि रूस इस अंतरिक्ष में पहले पहुंचने की रेस में सफलता हासिल कर लेगा। मून रेस को फाइनेंस करने को अमेरिका में जहां कैनेडी ने आíथक बल प्रदान किया तो रूस में निकिता ख्रुश्चेव ने इसे फाइनेंस किया, लेकिन चांद पर पहुंचने की चाहत ने पूरे विश्व को एकजुट करने का काम किया था।

अरबों अन्य लोगों की तरह मैं भी रेडियो पर अंतरिक्ष के किस्से और इससे जुड़ी अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्री के साथ मिलकर सुना करता था। मैं इस समय तक विज्ञान पत्रकार नहीं था, लेकिन मैंने 16 वर्ष की उम्र में 1957 में एक अखबार ज्वाइन कर लिया था। करोड़ों लोगों की तरह स्पुत्निक प्रथम के समय से लेकर 20 जुलाई, 1969 के प्रत्येक चरण को मैं लगातार फॉलो करता रहा। नील आर्मस्ट्रांग, बज एल्ड्रिन और माइक कोलिंस ने एक साथ पृथ्वी को छोड़ा था। ईगल का चांद को छूना एक ऐतिहासिक लम्हा था। हम ये जानते थे कि एस्ट्रोनॉट स्पेसक्राफ्ट से बाहर आएंगे और अंतरिक्ष में चलेंगे।

चंद्र अभियान से जुड़ी अफवाहें

झंडा फहराना
दावा
: फहराए गए अमेरिका के झंडे पर सलवटें पड़ी हुई थी, जबकि ऐसा संभव नहीं था, क्योंकि वहां वातावरण ही नहीं था।

हकीकत :  लंदन के साइंस म्यूजियम के डग मिलार्ड का कहना था कि झंडा सिर्फ एक वीडियो में हिल रहा है, इसे नील आर्मस्ट्रांग या बज एल्ड्रिन ने पकड़ा हुआ है, लेकिन वातावरण और घर्षण की गैरमौजूदगी के कारण ये जल्द ही रुक गया। पृथ्वी पर भी ये संभव है। अगर ये हिल रहा है, तो हिलता रहता, इसके लिए हवा की आवश्यकता कतई नहीं थी।

तारे नहीं
दावा
: अंतरिक्ष तारों से भरा हुआ है, ऐसे में सवाल उठता है कि चांद पर ली गई तस्वीर में ये दिख क्यों नहीं रहे हैं ?

हकीकत :  एस्ट्रोनॉट्स ने चमकदार सफेद ऑब्जेक्ट की तस्वीर ली हैं। ऐसी स्थिति में कैमरे का एक्पोजर टाइम ज्यादा होना चाहिए और अपर्चर कम होना चाहिए। गाíजयन के फोटोग्राफर ग्रीम रॉबर्टसन कहते हैं कि उन्होंने संभवत: तेज शटर स्पीड में तस्वीर खींची होगी, जिसकी वजह से बैकग्राउंड पूरी तरह से काला हो गया होगा।

जली फुटप्रिंट
दावा : चांद की सतह पर फुटप्रिंट बनाने के लिए पानी की जरूरत होती है। वरना वह मिट जते हैं, जैसा कि सूखी बालू में होता है।

हकीकत : चांद की धूल का आकार, बालू के आकार से भिन्न होता है और इसमें निशान बनाने के लिए नमी की आवश्यकता नहीं होती है। धरती पर पाउडर का व्यवहार कुछ इस तरह ही होता है। आप टैल्कम पाउडर पर चलकर इसे देख सकते हैं।

फोटोग्राफर
दावा : चांद पर पहुंचने के बाद एस्ट्रोनॉट्स द्वारा जो तस्वीरें ली गई थी, उसके लिए दूसरा व्यक्ति होना चाहिए था, जो ये तस्वीरें खींचता।

हकीकत :  ऑर्मस्ट्रांग का चांद पर पैर ईगल लैंडर के बाहर लगे हुए एक कैमरे से लिया गया था। वहीं ऑर्मस्ट्रांग के वहां पहुंचने के समय एल्ड्रिन ने तस्वीरें खींची थी। चांद पर छोड़े गए रिमोट कैमरे से वापस लौटने की तस्वीरें खींची जा सकती हैं।

हबल कवर अप
दावा : नासा ने हबल टेलीस्कोप का इस्तेमाल कर पिछले कई वर्षो से चले आ रहे विवादो को विराम दे दिया।

हकीकत :  हबल ने कई चौंकाने वाली तस्वीरें खोजी, जिसमें गैलेक्सी, सुपरनोवा और नेबूला के चित्र थे।

टेढ़ी-मेढ़ी परछाइयां
दावा : तस्वीरों में वस्तुओं की परछाइयां अलग-अलग कोणों पर पड़ रही हैं। इसका कारण है कि प्रकाश कई दिशाओं से आ रहा होगा, जैसा कि किसी टीवी स्टूडियो में होता है।

हकीकत : सूर्य से नजदीकी और असमतल धरातल के कारण फोटो में परछाइयां टेढ़ी-मेढ़ी नजर आती हैं। यदि प्रकाश कई ओर से आ रहा होता तो हरेक वस्तु की एक ही परछाईं क्यों दिख रही है ?

घातक रेडियोधर्मिता
दावा
: अपोलो के चंद्रयात्री मार्ग में पड़ने वाली घातक रेडियोधर्मिता के कारण चांद पर नहीं पहुंच सकते थे।

हकीकत : कथित वान एलेन बैल्ट्स वह स्थान है जहां पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र सौर रेडियोधर्मिता को एकत्र करता है। यह स्थान तब खतरनाक है जबकि वहां कई दिनों तक रहा जाए। चंद्रयात्री वह क्षेत्र कुछ घंटों में ही पार कर गए थे।

पत्थर पर लकीर
दावा
: चंद्र यात्रा के काफी बाद अपोलो 16 की यात्रा के बाद एक पत्थर की तस्वीर में उस पर अंग्रेजी अक्षर ‘सी’ लिखा देखा गया जिससे आशंका हुई थी कि यह यात्रा नकली थी।

हकीकत : ‘सी’ अक्षर नासा के मूल निगेटिव्स और प्रिंटों में नहीं दिखा था। इस मुद्दे पर गौर करने पर पता चला कि यह संभवत: फाइबर था जो कभी बाद में अस्तित्व में आया था।

कोक की बोतल
दावा
: एक ऑस्ट्रेलियाई महिला उना रॉनल्ड का कहना था कि उसने अपोलो 11 की तस्वीरों में चांद की सतह पर एक कोक की बोतल पड़ी देखी थी। इसलिए संभवत: यह पूरी फिल्म किसी स्टूडियो में तैयार की गई थी।

हकीकत : विशेषज्ञों के अनुसार उना ने ऐसी चीज देखने का दावा किया है जिसे पूरी दुनिया नहीं देख सकी थी और जिसका कोई सबूत भी नहीं है। इसलिए यह दावा निराधार है।

सौजन्य : गाजिर्यन

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