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दो टूक

फिजा में भोले बाबा की जयकार और राम-राम कर बीतते जा रहे थे एक-एक दिन। हर बार से एकदम उलट बिल्कुल शांत। पर जलाभिषेक के ऐन एक दिन पहले वही हुआ जिसकी आशंका थी। दिल्ली के चंद इलाकों में सड़क हादसों का शिकार होने के बाद कांवड़िये भड़क उठे और तोड़फोड़ कर डाली।

हमारी धर्म प्रधान सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना में कांवड़ यात्रा, ताजिया जुलूस जैसे आयोजन तो होते रहेंगे। सीखनी है तो इसके साथ सामंजस्य बनाने की कला। इस बात से इनकार नहीं कि शासन-प्रशासन की कोशिश से स्थिति काफी सुधरी है। खास तौर पर यूपी की कोशिशें सराहनीय हैं। पर सुधार की गुंजाइश अभी और है, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता।

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