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तो गरीब देश करेंगे सवा सौ फीसदी कटौती

 अच्छा हुआ रहस्य से पर्दा उठ गया। पिछले साल सारे समय हमें एक ढीठ किस्म का अंतरविरोध परेशान करता रहा। ग्रीनहाउसगैसों के उत्सजर्न में सरकार ने भारी कटौती का वादा किया था। साथ में वह नई सड़कें व रनवे बनाती रही, कोयला जलाने वालेबिजली घरों को मंजूरी देती रही, कार निर्माताओं का उद्धार करती रही और कम कार्बन वाले घरों की नियमावली को धता बताती रही। हो सकता है कल को हमें ऐसे प्रपत्रों की सीरीज प्रकाशित होती मिले, जिसमें कार्बन की कटौती का जिक्र हो। मसविदा पढ़ चुके एकसज्जन का कहना है कि नई नीतियों का मतलब 50 प्रतिशत तक की कटौती बाहर से खरीद ली जएगी। अगर ऐसा है तो इसकामतलब यह है कि सरकार वादा भले करे, पर सन् 2050 तक ब्रिटेन अपने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सजर्न में 80 प्रतिशत की कटौती नहीं करेगा। इसका मतलब है कि वह उसमें 40 प्रतिशत की कटौती करेगा। यानी यह हमारे आधे उत्सजर्न की क्षतिपूर्ति करेगा (यानी वह हमारी तरफ से कटौती करने के लिए दूसरे देशों को भुगतान करेगा)। इस तरह सरकार जलवायु परिवर्तन का कार्यक्रम एक प्रकार का मजाक बन कर रह जएगा।

हो सकता है कि मसविदा और अंतिम दस्तावेज के आंकड़ों में फर्क आ जाए, लेकिन फिलहाल हम जो जानते हैं, उसी को सही मानते हुए यह देखना चाहिए कि जब अमीर देश अपनी जिम्मेदारियां दूसरों पर डालेंगे तो क्या होगा। गणित का सामान्य तर्क कहता है कि भरपाई का कोई भी बड़ा कार्यक्रम अन्यायपूर्ण, अंतर्विरोधी और आखिरकार असंभव होता है। पिछले हफ्ते जी-8 के शिखर सम्मेलन ने ब्रिटेन के दो प्रमुख लक्ष्य अपनाए। उसका प्रस्ताव था कि दो डिग्री ग्लोबल वार्मिग रोकने के लिए विकसित देश 2050 तक ग्रीनहाउस गैसों में 80 प्रतिशत की कटौती करें। इसका मतलब है कि जी-8 ने ब्रिटेन के दोनों अंतरविरोधों को भी अपना लिया, क्योंकि इन दोनों लक्ष्यों में कोई संबंध नहीं है। चूंकि 80 प्रतिशत की कटौती से दो डिग्री की वार्मिग कम नहीं होने वाली है, दरअसल यह सही उपाय भी नहीं है। लेकिन कल्पना कीजिए, अगर दूसरे देश ब्रिटेन के लक्ष्य और उसके मसविदे के नजरिए को अपना लें तो क्या होगा। कृपया मेरा जिम्मा उठाइए , यह महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसमें कुछ आंकड़े भी शामिल हैं। पर मैं कुछ बुनियादी गणित का इस्तेमाल करूंगा।

जी-8 यह नहीं बताता कि विकसित देश का क्या मतलब है। पर मैं यह मान लेता हूं कि उसका मतलब क्योटो संधि के परिशिष्ट-1 में उल्लिखित देशों से है। यह वे देश हैं, जिन्होंने 2012 तक अपने ग्रीनहाउस गैसों को कम करने का वादा किया है। (अगर इसका तात्पर्य ओईसीडी देशों से है तो भी परिणाम ऐसा ही होगा।) ज्यादा सीधे तरीके से बात रखने के लिए मैं सिर्फ उसी उत्सजर्न पर विचार करूंगा, जो जीवाश्म ईंधन के जलने के होता है। परिशिष्ट-1 के बाकी 38 देश 15 अरब टन यानी वैश्विक उत्सजर्न का 51 प्रतिशत कार्बन डॉइआक्साइड निकालते हैं। अगर ब्रिटेन के प्रस्ताव के मुताबिक उन्हें आधा जिम्मा दूसरे पर डाल कर 80 प्रतिशत कटौती करनी है तो उन्हें दुनिया के कुल उत्सजर्न की 20 प्रतिशत कटौती खरीदनी होगी। इसका मतलब यह है कि अन्य देशों को हमारे क्षतिपूर्ति वाले कार्बन को सोखने के लिए ही अपने उत्सजर्न में 42 प्रतिशत कटौती करनी होगी।
 लेकिन जी-8 ने ब्रिटेन के एक और लक्ष्य को अपनाया है। वह है 2050 तक वैश्विक स्तर पर 50 प्रतिशत की कटौती। विश्व उत्पादन के 50 प्रतिशत का मतलब है 14.6 अरब टन। अगर परिशिष्ट -1 के देश अपने उत्सजर्न में 80 प्रतिशत की कटौती (इनमें भरपाई शामिल है) करते हैं तो वे वैश्विक उत्पादन को 12 अरब टन कम कर देंगे। दूसरे देशों को 2.6 अरब टन की और कटौती करनी होगी। अगर इसमें भरपाई वाली खरीददारी को जोड़ दिया जए तो उन देशों की कुल जिम्मेदारी 8.6 अरब टन की है, जो कि दुनिया के कुल उत्सजर्न का 60 प्रतिशत है।

अगर अमीर देश ब्रिटेन के प्रस्ताव को मानते हैं तो वे अपने कार्बन प्रदूषण को सिर्फ 40 फीसदी घटाएंगे, जबकि गरीब देश 60प्रतिशत। अगर वैश्विक न्याय का कोई अर्थ है तो अमीर देशों को गरीब देशों से ज्यादा कटौती करनी चाहिए। हमें बहुत ज्यादा कटौती करनी है और हम विकास के अवसरों को छोड़ भी सकते हैं। अगर ब्रिटेन जसा देश गहरी कटौती नहीं कर सकता तो और कोई नहीं कर सकता। जैसा कि हमने अपनी ‘हीट’ नामक किताब में लिखा भी है कि हम अपने जीवन स्तर को गंभीर नुकसान पहुंचाए बिना90 प्रतिशत की कटौती कर सकते हैं। पर इसके लिए एक राजनीतिक कीमत देनी होगी। व्यापारिक प्रतिष्ठानों से कहा ज सकता है कि जो पूंजी डूब गई है, वे उसे भूल जाएं। लोगों से कहा ज सकता है कि वे जिस तरह से जीते हैं, उसमें छोटे-मोटे परिवर्तन करें। लेकिन यह देश वही करता हुआ दिख रहा है, जो इसने इतिहास के औपनिवेशिक और उत्तर औपनिवेशिक काल में किया है। यह हमेशा अपनी राजनीतिक समस्याओं को परदेश में फेंकता रहा है, न कि उसका खुद सामना करता रहा है।
दरअसल जी-8 देश दो डिग्री की वार्मिग रोकने के लिए, जो 50 फीसदी वैश्विक कटौती का प्रस्ताव कर रहे हैं उससे कुछ होने वाला नहीं है। जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल (आईपीसीसी) ने 2007 में प्रकाशित रपट में कहा था कि अगर तापमान की दो डिग्री बढ़ोतरी को रोकना है तो 85 प्रतिशत की कटौती करनी होगी। आंकड़ों के जटिल जाल को आप के सामने न फैलाते हुए मैं सरल तरीके से यह बताना चाहता हूं कि अगर अमीर देश अपनी कटौती का 50 फीसदी जिम्मा गरीब देशों पर डाल देते हैं तो उन्हें सात अरब टन की कटौती करनी होगी। लेकिन वैश्विक स्तर हासिल करने के लिए उन्हें अपने उत्सजर्न को 10.8 अरब टन की और कटौती करनी होगी। कुल मिलाकर गरीब देशों को 17.8 अरब टन यानी 125 प्रतिशत की कटौती करनी होगी। इस कहानी का यही पेंच है।
लंबे समय में की जने वाली कटौती और अपना जिम्मा दूसरे देशों पर थोपे जने की कोशिश पूरे उद्देश्य के साथ धोखा करने जैसा है। अगर हमें सचमुच दो डिग्री वार्मिग को रोकना है तो अगले साल तक 10 प्रतिशत और 2012 तक 25 प्रतिशत की वैश्विक कटौती करनी होगी। पर ऐसा करने के लिए कोई सरकार अभी तक तैयार नहीं है। इसलिए आइए गरीब देशों को जंगल कटने से रोकने और प्रदूषण घटाने में मदद करें। पर यह न समझे कि इससे हमारी जिम्मेदारियां खत्म हो गई हैं।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं
ब्रिटिश अखबार ‘द गाजिर्यन’ से साभार

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