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उर्दू मीडिया : दादा और दीदी पर कैसे करें यक़ीं

बजट पेश हुए कई दिन गुजर गए फिर भी वे उर्दू अखबारों की सुर्खी बने हुए हैं। दोनों मंत्रियों के बजट का पोस्टमार्टम जारी है। सभी की समान सोच है कि रेल और आम बजट मुसलमानों को लालीपॉप थमाने भर की कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं। मदरसों का बुरा हाल है। मदरसा बोर्ड में सुधार की भारी गुंजइश है। सरकार का इस ओर ध्यान नहीं।

ऐसे में इनके तालिब इल्मों को सस्ती दर पर रेल यात्रा करने का ख्वाब दिखाना कहीं से व्यवहारिक नहीं लगता। प्रणव मुखर्जी ने मुसलमानों को राहत देने के प्रयास कम आई वॉश ज्यादा की है। सच्चर कमेटी के सुझवों पर अमल करने की बजट में इच्छा शक्ति नहीं झलकती। पिछले बजट की तुलना में इस बार अल्पसंख्यकों के हितों के लिए सात सौ करोड़ अधिक जरूर रखे गए, पर यह भी झुनझुना थमाने जसा ही है। उर्दू अखबार लिखते हैं कि 1700 करोड़ रुपये का इस बार का बजट केवल मुसलमानों पर नहीं, अल्पसंख्यक माने जने वाले सभी समुदायों पर खर्च होगा। इतनी रकम प्रति व्यक्ति पर सालाना 58 रुपये ही बैठती है। साप्ताहिक ‘जदीद मर्कज’ के प्रधान सम्पादक हिसामुल इस्लाम सिद्दीकी लिखते हैं ‘इतनी थोड़ी रकम ऊंट के मुंह में जीरे से ज्यादा नहीं।’

‘मुंबई हमले में लोकल कनेक्शन का दावा करने वालों को मुंबई पुलिस का जवाब..’ रोजनामा ‘इंकलाब’ में छपी इस रिपोर्ट से मुसलमानों ने राहत महसूस की है। दूसरी तरफ धमाकों में आतंकियों के स्थानीय कनेक्शन ढूंढ़ने वाले इस खबर से अवश्य मायूस हुए होंगे। देश में जब कहीं आतंकी हमले होते हैं, एक खास तबका मुस्लिमों को घेरने की जुगत में लग जता हैं। अमेरिका के 9/11 हमले के बाद तो पूरी दुनिया के मुसलमान संदेह के घेरे में आ गए थे। मुंबई ब्लास्ट को लेकर हिन्दुस्तान में वसा कुछ नहीं हुआ। सभी सम्प्रदायों ने इसका डटकर मुकाबला किया। मुसलमान भी पीछे नहीं रहे। फिर भी मुस्लिमों को गाहे-बगाहे घेरने वालों ने मौका हाथ से जने नहीं दिया। यही प्रचार करते रहे कि बगैर स्थानीय सपोर्ट के आतंकी इतने बड़े हमले की प्लानिंग और उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा सकते। अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई के आतंकियों के भारत के कई शहरों में फोन कॉल्स की डीटेल जारी करने के बाद तो इनके हौसले और बुलंद हो गए थे। लेकिन मुंबई क्राइम ब्रांच के ज्वाइंट कमिश्नर राकेश मारिया ने यह कहकर उनको मायूस कर दिया कि जांच एजेंसियों को आतंकियों के लोकल कनेक्शन के कोई सुराग नहीं मिले हैं। मुंबई से प्रकाशित ‘सहाफत’ की एक रिपोर्ट में कहा गया कि 23 से 25 नवंबर के बीच आतंकियों ने मुंबई, दिल्ली, गुड़गांव, पुणे, अमरावती, औरंगाबाद, इंदौर, बंगलुरू में कुल 41 कॉल्स किए। डॉक्टरों, गृहिणियों, सरकारी कर्मचारियों को किए गए इन कॉल्स की जांच कई टीम ने की। उनकी और उनके पारिवार की पृष्ठभूमि को खंगाला गया। फिर भी आईबी, मुंबई अपराध शाखा सहित दूसरी जंच एजेंसियों को लोकल कनेक्शन के सबूत नहीं मिले। आतंकियों ने जांच की दिशा भटकाने की खातिर हमले से पहले नियोजित ढंग से ये फोन किए थे। आठ से 41 मिनट तक की बातचीत में उन्होंने सभी से बेसिर-पैर की बातें कीं। ‘इंकलाब’ ने मुंबई धमाके के विशेष वकील उज्ज्वल निकम के हवाले से एक रिपोर्ट में कहा है कि आतंकियों ने दूरसंचार कंपनी फोनेक्स से बीओआईपी खड़क सिंह के नाम खरीदी थी। उम्मीद की जानी चाहिए कि मुंबई क्राइम ब्रांच की इस रिपोर्ट से मुसलमानों को संदेह की निगाह से देखने वाले कुछ सीख लें।

मिजाज के विपरीत उर्दू अखबारों ने पिछले सप्ताह ऐसी दो खबरें प्रमुखता से छापीं जो आमतौर पर कम दिखती हैं। एक खबर है केरल के एक दकियानूसी मुस्लिम परिवार की लड़की रहमत से जुड़ी। इसने स्नातक की संस्कृत भाषा की परीक्षा में अपने प्रदेश में टॉप किया है। दूसरी खबर, इलाहाबाद के करैली में ‘आओ मजहब सीखो कैंप’ चलाने वाले मोहम्मद इकबाल अमीर की है। इनका यह कैंप दरअसल एक तरह का स्कूल है जिसमें पढ़ने वाले हिन्दू और मुस्लिम बच्चों को बुनियादी तालीम देने के साथ सूर्य नमस्कार एवं कुरान के आयातों के माने तथा फायदे समझए जाते हैं। बलिया  में जन्मे और सन् 84 से इलाहाबाद में रह रहे इकाबल कहते हैं कि बलिया और छपरा में देश के दूसरे हिस्सों के मुकाबले सम्प्रदायिक तनाव कम होते हैं। इन शहरों में बच्चों को भाईचारे की खास तालीम दी जती है। इससे प्रभावित होकर उन्होंने यह स्कूल खोला है। मुस्लिम बहुल क्षेत्र में चलने वाले इस स्कूल में पहले दूसरे सम्प्रदाय के बच्चे नहीं आते थे। अब उनका अनुपात लगभग बराबर सा है।

लेखक हिन्दुस्तान से जुड़े हैं
malik_hashmi64@yahoo.com

 

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