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तत्व चिंतन में शिव

हमारे तत्व चिंतन में शिव का अर्थ मंगल है। शं करोति इति शंकरा:। जो दूसरों का मंगल करता है पर स्वयं अमंगल वेश बनाए रहता है, वही शिव है। ‘जोगि जटिल अकाम मन, नगन अमंगल वेश’ जिनके पास कुछ नहीं, उनका सहारा शिव है। जो शिव की शरण में नहीं, वह शव है। शिव ही नटराज हैं। सारी विधाओं के देव शिव हैं। व्याकरण के प्रणोता शिव हैं। ‘नृत्यावसाने नटराज राजो ननाद डंका नवपंच वारम्’ उन्होंने चौदह बार डंका बजाया। इसलिए व्याकरण के चौदह नाद हैं। शिव तंडु ऋषि के शिष्य थे। इसलिए उनकी नृत्य शैली तांडव है।

आचार्य अभिनवगुप्त ने लिखा है-‘आंगिकम भुवनम्यस्य वाचिकम! सर्व वांड्मय आहार्य चन्द्रतारादि: तम्र नम: साविकं शिवम्‘ अर्थात सारी सृष्टि ही नटराज का अभिनव है। शिव के अंगों का संचालन, सृष्टि, उनका आंगिक नृत्य है। शब्द-स्वर ताल और लय उनके वाचिक नृत्य हैं। चंद्र, तारा आदि इनके आहार्य नृत्य हैं। मंत्र व्यवस्था के देवता भी शिव ही माने गए हैं। मारन-मोहन-उच्चाटन-स्तंभन और वशीकरण मंत्र के ये पांच अंग हैं। इनका मास श्रावण मास। शिव ही आदि हैं और शिव ही अंत। उद्भव, विकास और अंत के देवता शिव हैं। उत्पत्ति, स्थिति और लय का शमन करने वाले शिव हैं। सृष्टि को अक्षुण्य रखने के लिए पुरुष के साथ प्रकृति का मिलन आवश्यक है। प्रकृति और पुरुषमय ही सारी सृष्टि है। शिव पुरुष हैं, उनके साथ प्रकृति रूपा पत्नी पार्वती।
जनम कोटि लगि रगर हमारी। वरऊ  शंभु न त रहहू कुवारी। अर्द्धनारीश्वर, शिव के सभी रूपों में उत्कृष्ट रूप है। समाज में स्त्री-पुरुष समानता के लिए अर्द्धनारीश्वर ही भारतीय समाज का साध्य रहा है। शिव नीलकंठ भी हैं। महान योगी, महान त्यागी और बलिदानी का आदर्श। शिव की महानता, उनका आदर्श, उनके बलिदानी होने का रहा है। इसलिए तो सब देव हैं, पर शिव हैं महादेव।

मृदुला सिन्हा

 

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