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खिलाड़ी की गरिमा

अगर विश्व स्तर पर शानदार प्रदर्शन कर रही रेनू गोरा पटियाला में अतिथियों के जूठे कप साफ कर रही थी, तो इसमें आश्चर्य नहीं है। रेनू 70 किलोग्राम वर्ग में आज भी राष्ट्रीय चैंपियन है और पटियाला के राष्ट्रीय खेल संस्थान में कोचिंग का कोर्स कर रही है, लेकिन वह भारतीय समाज और संस्थान चलाने वालों के व्यापक दुराग्रहों का मुकाबला नहीं कर सकती। उसके खिलाफ दो तथ्य हैं जो इस स्तर पर पहुंचने के बाद भी वह सम्मान और गरिमा नहीं मिलने देते, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाने वाले खिलाड़ी को मिलना चाहिए। पहला तथ्य यह है कि वह आर्थिक रूप से सशक्त वर्ग से नहीं है और दूसरा तथ्य यह है कि वह महिला है। किसी समृद्ध वर्ग के पुरुष खिलाड़ी से यह उम्मीद नहीं की जएगी कि वह अतिथियों को चाय दे और फिर उनके जूठे कप भी साफ करे। रेनू और उसके साथ की दूसरी बॉक्सर सोनिका से सहज ही अधिकारी यह उम्मीद करते हैं कि वे ऐसे काम करें।

पटियाला में पुरुष खिलाड़ी भी थे, लेकिन ऐसे कामों के लिए मुख्यत: इन दो लड़कियों को ही क्यों चुना गया यह साफ है। महिलाएं हमारे समाज में कई बंधन तोड़ रही हैं और तमाम क्षेत्रों में अपनी जगह बना रही हैं, खेलों में ही साइना नेहवाल, सानिया मिर्जा से लेकर तो मेरीकॉम जैसी लड़कियों ने अपना झंडा फहराया है, लेकिन समाज में मौजूद दुराग्रहों की दीवारें बहुत धीरे-धीरे टूटती हैं। यह सही है इस इस तरह की बातों से महिलाओं की तरक्की रुकने वाली नहीं है, अपने जीवट और लगन के सहारे वे अपनी जगह बना ही लेंगी, लेकिन खेलों के कर्ताधर्ताओं का ऐसा आचरण उस उद्देश्य के ही खिलाफ जता है, जिसके लिए उन्हें नियुक्त किया गया है। खेल की बुनियादी अवधारणा में ही श्रेष्ठता का सम्मान और व्यक्ति की गरिमा है। खेल में किसी खिलाड़ी का सम्मान उसकी उपलब्धियों और आचरण पर निर्भर करता है, न कि अन्य गैर जरूरी तथ्यों जैसे आर्थिक स्थिति या लिंग पर। जो लोग खिलाड़ी की हैसियत उसके गरीब या स्त्री होने से आंकते हैं उन्हें न खेल समझ में आया है, न बदलते समाज का शास्त्र। और अगर आज भारतीय खिलाड़ी दुनिया में अपना नाम कर रहे हैं, यह तो इनकी वजह से नहीं है, बल्कि इनके बावजूद है।

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