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सब्जियां हरी, गृहिणियां लाल

विकासपुरी विधानसभा क्षेत्र के निगम वार्ड सं.-123, की जे. जे. कॉलोनी हस्तसाल रोड की शनिबाजर स्थित इंदिरा सब्जी मार्केट उत्तम नगर क्षेत्र की एक अत्यंत व्यस्त सब्जी मंडी बन गई है। इस सब्जी मंडी में सरकार द्वारा स्थापित की गई प्रमुख थोक सब्जी मंडियों से माल तो आता ही है साथ ही कुछ सब्जी विक्रेता हस्तसाल गांव के आस-पास के कुछ अन्य गांवों के खेतों से हरी एवं ताज सब्जियां खरीद कर यहां बेच रहे हैं। यह सब्जियां मुंह मांगे दाम पर योजनाबद्ध तरीके से बेची जा रही हैं। मुनाफे व कीमतों का जब कोई ग्राहक विरोध करता है तो यह कह दिया जता है कि वर्षा न होने के कारण दाम बढ़ रहे हैं। सब्जी खरीदते समय गृहिणियों के लाल चेहरों को आसानी से परखा जा सकता है। दिल्ली सरकार इस तरफ ध्यान दे।

किशनलाल कर्दम, उत्तमनगर, नई दिल्ली

मूर्ति संपन्न देश

मायावती जी की पहचान गरीबों के नेता तथा कठोर निर्णयकर्ता के रूप में है। आजकल वे मूर्तियों का निर्माण व स्थापना करने में जुटी हैं। मन चंगा तो कठौती में गंगा। जहां जएं वहीं भगवान। जनता के पैसों को इस तरह से बरबाद करना प्रशंसनीय कार्य नहीं है। यदि देश के सभी मुख्यमंत्री भगवान की मूर्तियां स्थापित करने लगें और विकास के कार्य भूल जाएं तो भारत पांच साल के अंदर मूर्ति सम्पन्न देश बन जएगा। जनता की स्थिति जैसी भी हो, क्या फर्क पड़ता है देश की पहचान तो बन गई।

शलेन्द्र कुमार, नेहरू विहार, नई दिल्ली

न्याय की लाचारी

एक दुखद घटना का दुखद अंत आपके विचारों व न्याय की लाचारी में साफ झलक रहा था। ठीक लिखा है आपने कि दिनदहाड़े एक शिक्षक की हुई हत्या को हादसा करार देना ही मुख्यमंत्री व उनकी सरकार की बदनीयती की ओर स्पष्ट संकेत कर रहा था। अब न्यायालय में अधूरे व अस्पष्ट साक्ष्य पेश कर न्यायालय को भी एक प्रकार से विवश कर दिया गया कि वह अभियुक्तों को साक्ष्यों के अभाव में रिहा करे और इसमें वे सफल भी रहे। स्वयं सरकारी वकील का यह कहना कि उन्हें पर्याप्त सबूत उपलब्ध ही नहीं कराए गए, मुख्यमंत्री की कार्यशली पर प्रश्नचिह्न् लगाता है। यह आकलन भी आपका वक्त पर सही सिद्ध होगा कि जनता इस हत्याकांड पर भाजपा को ऐन चुनाव के वक्त उसकी औकात बता सकती है। ऐसे जघन्य हत्याकांड के लाचारी भरे निर्णय का मुख्यमंत्री द्वारा स्वागत किया जाना पीड़ा को बढ़ाने वाला है। कुल मिलाकर अच्छा नहीं हुआ कुछ भी।

इन्द्रसिंह धिगान, किंग्जवे कैम्प, दिल्ली

ड्रेस नहीं, मानसिकता बदलें

छात्राओं के जींस पहनकर आने पर रोक लगाने का आदेश सिवा तालिबानी फरमान के कुछ नहीं है। एक तरफ महिला सशक्तिकरण की बात होती है और दूसरी तरफ नैतिकता के नाम पर उसे खूंटे से बांधकर रखा जता है। सवाल ड्रेस कोड का नहीं हमारी मानसिकता का है। इसे लागू करने की वजह महिलाओं के साथ बढ़ते दुष्कर्म बताए जा रहे हैं, तो घर में काम करने वाली नौकरानी से लेकर मासूम दुधमुंही बच्चियों के साथ दुष्कर्म क्यों होते हैं? अगर बदलाव चाहते हैं तो ड्रेस कोड में नहीं, बल्कि पाठयक्रम में हो, जहां अन्य विषयों के साथ नैतिकता का पाठ भी पढ़ाया जाए।

प्रियंका गोस्वामी, जमिया, नई दिल्ली

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