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कांबली जैसे कई उदाहरण हैं भारतीय क्रिकेट में

कांबली जैसे कई उदाहरण हैं भारतीय क्रिकेट में

भारत के पूर्व बल्लेबाज और महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर के बचपन के मित्र विनोद कांबली पिछले कुछ समय में गलत कारणों से खबरों में हैं। कांबली ने हाल में एक टीवी रियलिटी शो में यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया था कि जब वह अपनी बल्लेबाजी के शीर्ष पर थे तब तेंदुलकर ने उन्हें खुद को नुकसान पहुंचाने से रोकने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए।

बाएं हाथ के इस क्रिकेटर ने हालांकि मुंबई में 14 जुलाई को 2011 वर्ल्ड कप के लोगो के अनावरण के अवसर पर मुंबई के एक पांचसितारा होटल में जुटे संवाददाताओं के सामने इस बात से इंकार किया कि उन्होंने तेंदुलकर पर अपनी पर्याप्त मदद नहीं करने काआरोप लगाया। कांबली हालांकि अब अजीब स्थिति में फंस गए हैं क्योंकि टीवी पर इस कार्यक्रम की एक फुटेज दिखाई गई है जिसमें प्रस्तोता जब उनसे पूछता है कि क्या खुद को नुकसान पहुंचाने वाली उनकी आदतों से बचाने के लिए क्या तेंदुलकर कुछ अधिक कर सकते थे तो वह कहते हैं, मुझे लगता है कि हां।

कांबली का यह संदर्भ हालांकि उनके खुद के आकलन के बारे में हो सकता है क्योंकि यह बल्लेबाज अपने कैरियर की शुरुआतमें टेस्ट क्रिकेट लगातार दो दोहरे शतक के साथ दिखाई अपनी प्रतिभा पर खरा नहीं उतरा और अनुशासनहीनता से भरी अपनीनिजी आदतों के चलते अपना कैरियर खराब कर दिया।

कांबली ने कैरियर के शुरुआत सात टेस्ट में से दो दोहरे शतक के अलावा दो और शतक जड़े लेकिन इसके बाद 1994-95 मेंभारत आई वेस्टइंडीज के तेज गेंदबाजों ने कर्टनी वाल्श और केनी बेंजमिन की अगुआई में शार्ट गेंद के प्रति इस बल्लेबाजी कीकमजोरी को उजागर किया।

वह इसके बाद न्यूजीलैंड के खिलाफ अक्तूबर-नवंबर 1995 में घरेलू सरजमीं पर केवल एक और टेस्ट खेले लेकिन प्रभावीप्रदर्शन करने में विफल रहे जिसके बाद 1996 में भारत के इंग्लैंड के अगले दौरे पर उनके नाम पर विचार नहीं किया गया। इस दौरे पर सौरव गांगुली और राहुल द्रविड़ ने बेहतरीन पदार्पण किया।

मध्यक्रम में वीवीएस लक्ष्मण के आने से कांबली की मुश्किलें और बढ़ गई। उस दौर में कांबली के कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीनऔर तेंदुलकर थे। बाएं हाथ के इस बल्लेबाज ने वनडे टीम में कई बार वापसी की लेकिन नवंबर 1995 के बाद उन्हें कभी भारतीय टेस्ट टीम में नहीं चुना गया।

कैरियर की शुरुआत में सफलता देखने के बाद गलत रास्ते पर चलने वाले कांबली पहले भारतीय क्रिकेटर नहीं हैं और लुभावनीइंडियन प्रीमियर लीग जैसे टूर्नामेंटों की मौजूदगी में युवाओं को सही काउंसिलिंग नहीं मिलने पर ऐसा करने वाले वह अंतिम क्रिकेटरभी नहीं होंगे।

इसमें दो प्रतिभावन स्पिनरों मनिंदर सिंह और लक्ष्मण शिवरामकृष्णन के अलावा विकेटकीपर सदानंद विश्वनाथ का भी नाम आताहै जो 1980 के दशक में क्रिकेट में तेजी से चमकने के बाद तेजी से गुमनामी में खो गए। शिवरामकृष्णन अब प्रतिष्ठित टीवी कमेंटेटर हैं जबकि विश्वनाथ के साथ अंपायरिंग में भाग्य आजमाने के बाद मनिंदर निजी टीवी चैनलों के लिए विशेषज्ञ के तौर पर कार्यक्रम देते हैं।

इसके विपरीत कम से कम दो ऐसे बल्लेबाज है जिन्हें टेस्ट क्रिकेट की शुरुआत में बेहतरीन प्रदर्शन के बावजूद नजरअंदाज करदिया गया। ये दोनों बल्लेबाज माधव आप्टे और दीपक शोधन वेस्टइंडीज के पहले दौरे पर विजय हजारे की अगुआई में जाने वाली भारतीय टीम के सदस्य थे। इन दोनों ने हालांकि वहां से लौटने के बाद कभी कोई टेस्ट नहीं खेला। आप्टे ने सात टेस्ट में करीब 50 की औसत से रन बनाए लेकिन इसके बावजूद उन्हें कभी दोबारा मौका नहीं दिया गया। वह 60 बरस से अधिक की उम्र तक क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया के लिए प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेलते रहे।

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