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दीवारें गिराते बॉक्सर

दीवारें गिराते बॉक्सर

मुक्केबाज अर्नी शेवर्स के मुक्कों की ताकत विख्यात थी। मोहम्मद अली ने उनसे मुकाबले के बाद (अली वह मुकाबला जीते थे) कहा कि- ‘उसके मुक्कों से अफ्रीका में मेरे रिश्तेदारों की हड्डियां तक कांप गई थी’। पटियाला के राष्ट्रीय खेल संस्थान में बॉक्सिंग की विश्व चैंपियनशिप के लिए भारतीय टीम चुनने के लिए ट्रायल हो रहे थे और देश के बीस-बाईस श्रेष्ठ बॉक्सर अपने प्रतिद्वंद्वी के हरियाणा या मणिपुर में रहने वाले रिश्तेदारों की हड्डियां कंपाने में जुटे थे।

पिछले कुछ सालों में भारत विश्व मुक्केबाजी में एक महत्वपूर्ण ताकत के रूप में उभरा है और अब भारतीय मुक्केबाज सिर्फ खेल भावना से भाग लेने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में नहीं जाते, वे पदकों के लिए वहां जाते हैं। अगले साल अंतरराष्ट्रीय अमेच्योर बॉक्सिंग फेडरेशन की पेशेवर लीग शुरू हो जने के बाद भारत अपने दर्शकों की तादाद और पैसा कमाने की संभावना के चलते शायद ओर महत्वपूर्ण ताकत बन कर उभरे। इस उम्मीद के केन्द्र में ये बीस बाईस बॉक्सर हैं जो अंतरराष्ट्रीय स्तर के हैं और जो पटियाला की गर्मी और उमस में ट्रेनिंग कर रहे थे और सेलेक्शन ट्रायल में हिस्सा ले रहे थे। इनमें ओलंपिक पदक विजेता विजेंदर सिंह हैं, अखिल कुमार, जितेंदर ननाओ सिंह और सुरंजय सिंह हैं।

बॉक्सिंग शायद दुनिया का सबसे कठिन खेल है, सही अर्थो में खून और पसीना बहाने का आदिम खेल। जाहिर है इसके लिए ट्रेनिंग भी बहुत कड़ी होती है और मुकाबले भी, जसे कि अखिल कहते हैं कि- ‘जीतो तो भी मार खाओ, और हारो तो भी मार खाओ।’ अखिल की आंख के नीचे नील पड़ा है और कान के पीछे सूजन है जब वे बता रहे हैं कि कैसे जितेंद्र जब ओलंपिक क्वार्टर फाइनल में खेले थे तब उनकी ठोड़ी पर पिछले मुकाबले में लगी चोट थी जिसमें दस टांके लगे थे, दो टांके सेमीफाइनल में टूट गए। रेलवे के बॉक्सर दिवाकर प्रसाद इस कैंप में थे, दिवाकर को लगातार दो बार हेपेटाइटिस हो चुका हे, दूसरी बार हेपेटाइटिस ‘बी’, जिसमें डॉक्टरों ने उम्मीद छोड़ दी थी और उनके ठीक होने को ईश्वर की कृपा माना था। दिवाकर हालांकि विश्व कप वाली टीम में नहीं चुने गए हें लेकिन वे भी भारत के सर्वश्रेष्ठ बॉक्सरों में से हैं। बॉक्सिंग में ऐसे जीवट और साहस के किस्से कदम-कदम पर सुनने जाते हैं।

विजेंदर हरियाणा रोडवेज के एक ड्राइवर के पुत्र हैं और ओलंपिक में पदक जीतने के बाद स्टार हो गए हैं। विजेंदर के बारे में लोगों को शक था कि इस स्टारडम के चलते वे ग्लैमर में फंस गए हैं और ट्रेनिंग पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। पिछले दिनों एशियाई चैंपियनशिप में पदक जीत कर उन्होंने यह शक तोड़ दिया बल्कि जनकारों का कहना है कि इस चैंपियनशिप में वे इतना बढ़िया खेले जितना ओलंपिक में नहीं खेले थें। सेलेक्शन ट्रायल में एक ही राउंड में वे सिद्ध कर देते हैं कि अपने भार वर्ग में वे सर्वश्रेष्ठ हैं। शाम को ट्रायल के वक्त वे एक बड़ी सी आलीशान कार में आते हैं और सुबह मुकाबला लड़ने के बावजूद अकेले अभ्यास में लग जते हैं, जिस वक्त बॉक्सिंग रिंग में मुकाबले चल रहे हैं और सब उन्हें देखने में मुब्तिला हैं विजेंदर हाथ में वजन उठा कर पंच मारने का अभ्यास कर रहे हैं।

ये सारे ही बॉक्सर बहुत ही औसत या गरीब परिवारों से हैं और छोटे-छोटे गांवों से आ कर अब अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग में सफलता पाने का आत्मविश्वास लिए हुए हैं। बॉक्सिंग की वजह से इन्हें ठीक-ठाक नौकरियां रेलवे में, सेना में, पुलिस में मिल गई हैं। पुराने जमाने में खिलाड़ियों की महत्वाकांक्षा इतनी ही होती थी, ठीक-ठाक नौकरी पाने की। लेकिन अब ये खिलाड़ी विश्व चैंपियनशिप में या ओलंपिक में पदक पाने से कम पर समझोता करने को तैयार नहीं हैं। इसके लिए वे पसीना बहा रहे हैं, चोटें सह रहे हैं और उसके बाद वैसे ही दोस्ताना हंसी मजाक में जुटे हैं, जैसे किसी भी खेल के खिलाड़ी होते हैं। सरकारी और निजी तंत्र भी थोड़ा ज्यादा चुस्त और उदार हुआ है, इनकी सुविधाएं अभी पर्याप्त नहीं हैं लेकिन पहले से बेहतर हैं, लेकिन साधनों का अपर्याप्त होना इन नौजवानों के जोश और लगन को कम नहीं कर पाता।

 

विजेंदर, अखिल या दिवाकर प्रसाद जसे लोग इस साहस और जीवट की कहानी के पात्र हैं, लेकिन सबसे बड़ी कहानी पटियाला में नहीं, इम्फाल में है। मेरी कॉम अपने भार वर्ग की चार बार विश्व चैंपियन बन चुकी है। तीन बारचैंपियनशिप जीतने के बाद मेरी कॉम गृहस्थी में रम गई क्योंकि उन्हें जुड़वां बेटे हुए। अपने बच्चे पालते हुए मेरी काम् ने ट्रेनिंग शुरू की और लगभग बीस किलोग्राम वजन घटाया और उसके बाद फिर एक बार विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। लेकिन अब तक तो उन्हें राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार नहीं मिला। इन दिनों फिर से खेल रत्न की घोषणा होनी है, देखिए मेरी कॉम को अब भी मिलता है या नहीं। मेरी कॉम की कहानी इसलिए बड़ी है क्योंकि वे महिला हैं। महिलाओं के साथ कैसा सलूक किया जाता है यह ‘हिन्दुस्तान’ में छपी खबर से स्पष्ट है कि विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतने वाले रेनू गोरा राष्ट्रीय खेल संस्थान में जूठे कप धो रही थी।

बॉक्सिंग की दुनिया इसलिए दिलचस्प है क्योंकि यह समाज के वंचित और गरीब तबकों की दुनिया है जो अपने हौसले और मेहनत के सहारे अपनी जगह बना रहे हैं। किसी जमाने में बॉक्सिंग अमेरिका का सबसे प्रतिष्ठित और लोकप्रिय खेल था, उसमें अश्वेत लोगों ने अपनी जगह बनाई और गोरे लोगों को चुनौती दी। अमेरिका में नस्ली भेदभाव कितना था और बॉक्सिंग चैंपियन की प्रतिष्ठा कितनी थी इसका अंदाज इस बात से लग सकता है कि जब पहले अश्वेत हैवीवेट बॉक्सिंग चैंपियन जक जॉनसन ने एक पूर्व चैंपियन जेम्स जेफ्रीज को हराया तो अमेरिका के पचीस राज्यों में पचास से ज्यादा शहरों में नस्ली दंगे हो गए थे।

आज का भारत सौभाग्य से सौ साल पहले के अमेरिका जैसा नहीं है लेकिन ये नौजवान बॉक्सर कई दीवारें तोड़ रहे हैं और भारत को ज्यादा व्यापक और समृद्ध बना रहे हैं।

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