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ब्राम्हणों ने बनाया दोहली भूमि संघर्ष मोर्चा

 किसी जमाने में किसी यजमान ने पंडित जी को भूमि दान कर, पुण्य कमाया। अब पंडितजी को इसी भूमि में अपने नाम की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। दान में मिली भूमि थोड़ी -थोड़ी  थी। कहीं 500 गज तो कहीं 700 गज वो भी अलग-अलग जगहों पर। पंडितजी इन जमीनों पर खेती करते रहे।

100-150 साल पहले की कहानी है। भले ही पंडितजी हल जोतते रहे मगर खेतों में नाम यजमान का ही रहा लिहाज अंग्रेजों के जमाने में खेतों के लगान भी वे ही देते रहे। स्वतंत्रतता प्राप्ति के बाद लगान का सिस्टम खत्म हो गया। कृषि भूमि पर टैक्स लगता नहीं हैं सो असली जमीन मालिकों के वंशजों को इससे मतलब नहीं रहा। जमीन की चकबंदी हुई यहां वहां छितराई हुई जमीनें एक कर दी गई।

अब पंडितजी के हिस्से में खेत का एक बड़ा टुकड़ा था कहीं एक एकड़, दो एकड़ तो कहीं इससे ज्यादा। गरीब ब्राहणों को पंडिताई के अलावा खेतों का भी सहारा हो गया। अब प्रदेश में जमीनों की कीमतें बढ़ गई हैं। सो ब्राम्हणों समाज को यह डर समा रहा है कि चूंकि दान में मिली जमीनों में उनके नाम नहीं हैं, सो ये उनसे छिन सकती हैं।

दूसरी तरफ यह भी कि उस जमीन पर न तो वे कृषि  ले सकते हैं न ही ऋण माफी योजना का लाभ उठा सकते हैं । ऐसी भूमि नाइयों के पास भी है। पुराने जमाने में किसी खुशी के मौके पर जमींदार यजमान ब्राम्हणों और नाई को भू दान किया करते थे।

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  • Web Title:दान की भूमि के लिए लड़ाई