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सतत रचनाशील रहने की बेचैनी

कई बार पुस्तिकाएं वह काम करती हैं, जो बड़े-बड़े ग्रंथ नहीं करते। पहली बार जो पुस्तिका मैंने पढ़ी थी, वह थी- ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो।’ उसके बाद भगत सिंह की पुस्तिका ‘आमी नास्तिक केनो’ (मैं नास्तिक क्यों हूं)। ये पुस्तिकाएं महान साहित्य के रूप में समाहृत हैं।

हाल में ही बांग्ला में लालगढ़, नंदीग्राम, सिंगुर और सेज पर तीन दजर्न से ज्यादा पुस्तिकाएं प्रकाशित हुई हैं और इन सबका अलग सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व है। इसी तरह की कई पुस्तिकाएं हिंदी में भी छपती रही हैं। मेरे सामने अभी जो पुस्तिकाएं हैं, वे हैं- ‘संसद ऐसे चलती है’, ‘अपना नमक बचाएं’, ‘नेपाल : हिंदू राष्ट्र होने की त्रासदी’ और ‘गोहाना।’
इन सभी के लेखक अनिल चमड़िया हैं। हिंदी के नौजवान पत्रकारों-टिप्पणीकारों में अनिल अलग महत्व रखते हैं। पलामू में जबहमने तीसरी बार 1984 में राष्ट्रीय बंधुआ मोर्चा चौपाल की थी तो उसकी लंबी रिपोर्ट अनिल ने ‘अवकाश’ में लिखी थी। यह देखकर मुझे अच्छा लगता है कि विगत ढाई दशकों के दौरान अनिल ने स्वतंत्र पत्रकारिता करते हुए भी उन मुद्दों को उठाया, जिसे मुख्यधारा का मीडिया हाशिए पर फेंक चुका था।
दलितों की चिंता, अल्पसंख्यकों की चिंता और आदिवासियों की चिंता अनिल के लेखन-सरोकारों के मूल में रही है। अनिल खूब लिखते हैं और खुलकर लिखते हैं। सर्वे करते हैं और वह बहुत परिश्रम से करते हैं। उनकी लंबी रपट ‘आदिवासी घट रहे हैं’ आज से इक्कीस साल पहले ‘सांचा’ के अप्रैल 1988 के अंक में छपी थी। वह आंखें खोल देने वाली तथ्यापरक रपट है। अनिल ने दो दशक पहले ही बता दिया था कि जिस रफ्तार से आदिवासियों की आबादी घट रही है, कई जनपद आदिवासी विहीन हो जाएंगे।

आज हम देख सकते हैं कि बिहार के बारे में यह भविष्यवाणी सही साबित हुई है। अनिल ने उन कारणों पर प्रकाश डाला, जिसके फलस्वरूप बिहार में 1961 में आदिवासियों की जो आबादी 9.41 प्रतिशत थी, वह 1981 में घटकर 8.31 प्रतिशत हो गई। आबादी घटने और जल-जंगल-जमीन से आदिवासियों के बेदखल होने की घटनाएं आज हम पूरे देश में देख सकते हैं। बंगाल से लेकर गुजरात-महाराष्ट्र में मैंने शिद्दत से इस समस्या को महसूस किया है।
आदिवासियों की तरह देश में दलितों पर होने वाले अत्याचार पर जिस तरह अनिल ने कलम चलाई वही दलितोत्थान का विधायक पंथहै। मैं बंगाल में भी निरंतर महसूस करती हूं कि यहां के वाम शासन में भी दलित समस्या है। वाम राज में ही दलित कन्या चुनी कोटाल को मरने को बाध्य किया गया था। उसे इसलिए उच्च शिक्षा से वंचित करने की साजिश रची गई, क्योंकि वह दलित थी। अनिल का नैतिक बल बहुत ऊंचा है और इसीलिए ऐसे नौजवानों के प्रति मैं बहुत श्रद्धाशील रहती हूं। वे किसी समस्या पर लिखने के लिएसांख्यिकीय विश्लेषण करते हैं, सम्बद्ध लोगों से इंटरव्यू करते हैं और तथ्यों की प्रामाणिकता जांचते हैं। बंगाल में यही काम आशीष घोष करते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि आशीष का लेखन सिर्फ बांग्ला भाषियों के लिए है या अनिल चमड़िया का लेखन सिर्फ हिंदी प्रदेशों के लिए।


दलितों-आदिवासियों और गरीबों के जो सवाल हिंदी पट्टी से उन्होंने लिए हैं, वे हर प्रांत, हर देश के लिए सही हैं, क्योंकि गरीबी या पिछड़ापन स्थान निरपेक्ष है? ‘नेपाल : हिंदू राष्ट्र होने की त्रासदी’ अनिल की ऐसी पुस्तिका है, जिसका नेपाल के लिए जितना महत्व है, कदाचित उससे बहुत ज्यादा भारतवर्ष के लिए। क्योंकि धर्म की आड़ में उन्माद का वातावरण बनाने और सामाजिक समन्वय को खतरे में डालने की कम कोशिशें अपने यहां नहीं होतीं।
छह दिसम्बर 1992 को जिस तरह बाबरी मस्जिद तोड़ने के लिए उन्माद का वातावरण बनाया गया, या फिर गुजरात में नरसंहार चलाया गया- अल्पसंख्यकों के खिलाफ, एकतरफा नरसंहार अभियान तो यह त्रासदी उस देश में भी है जिसके तीन सांस्कृतिकसंबोधन रहे हैं- भारत, आर्यावर्त और हिंदुस्तान।


इन संबोधनों को धर्माधता विकृत करती है। इसी तरह की विकृतताओं की तरफ अनिल इशारा करते हैं। निरंतर रचनाशील रहने की अनिल में उत्कट बेचैनी रहती है। वह एक्टिविस्ट के रूप में भी समझोता विहीन भूमिका का निर्वाह करते हैं। अनिल का अधिकतर लिखा परिवर्तनकामी है। उनका एक्टिविज्म भी परिवर्तन की कामना में चलता है। इस अनिल की पहचान आज से 18 साल पहले1991 में मेरे अत्यंत आत्मीय उत्तम सेनगुप्त ने कर ली थी।
उत्तम तब टाइम्स ऑफ इंडिया के पटना संस्करण में स्थानीय संपादक थे और अनिल पर उन्होंने लंबी रिपोर्ट प्रकाशित की थी। उसका शीर्षक था- ‘नो आम्चेयर जर्नलिस्ट फेस इन द क्राउड।’ भीड़ में अलग चेहरा बनने के लिए अलग राह बनानी पड़ती है। वही सभी कलाओं में काम्य है।

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