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‘सच’ के संसार से मनोरंजन

हिंदी के मनोरंजन चैनलों को बदलिये, आपको वहां कसावट लिए चुस्त-दुरुस्त कार्यक्रमों के बजए बिना संपादित, कच्चे और भोंथरे किस्म के कार्यक्रम देखने को मिल जएंगे। ऐसा ही एक कार्यक्रम है इस सप्ताह शुरू हुआ रियलटी शो - सच का सामना। इसका एक एपिसोड देखिये और आप समझ जाएंगे कि यह सब कहने का क्या मतलब है। निसंदेह, इस शो का खासा प्रचार हुआ है। इसे फिल्मों और टेलीविजन पर कभी-कभार दिखाई देने वाले राजीव खंडेलवाल प्रस्तुत कर रहे हैं। मूल रूप से यह इसी साल शुरू हुए अमेरिकी रियलटी शो मोमेंट ऑफ ट्रथ का देसी संस्करण है। इस शो में भाग लेने वालों से नितांत ही निजी किस्म के सवाल पूछे जाते हैं, हर अगले चक्र में यह सवाल कुछ ज्यादा ही बेधड़क और निजी होते जाते हैं। अगर आपको अगले चक्र में जाना है तो सच बोलिये, क्योंकिपॉलीग्राफ चल रहा है, झूठ बोला तो आप बाहर और एक करोड़ का इनाम भी हाथ से निकला। आसान लगता है? पर यह आसान है नहीं। क्योंकि हर सवाल आपकी जिंदगी के ऐसे राज खोलने को तैयार है, जिन्हें आप खुद से भी छुपाना चाहते हैं। सोचने का जरा भीमौका नहीं। और ये सारे राज टेलीविजन दर्शकों के सामने खुलते हैं। इससे भी खतरनाक यह कि आपके अपने वहीं टेलीविजनस्टूडियो के सोफे पर बैठे होते हैं।

जब अमेरिकी शो शुरू हुआ था तो यह माना गया था कि शो पूरी तरह से पश्चिमी लब्बो-लुबाब वाला है, और यह भारत में नहीं चलने वाला। उसके सवाल खासे अजीबोगरीब थे, ज्यादातर सेक्स संबंधी बेवफाई के, गैरवाजिब रिश्तों के। भारत जैसी जगह में ऐसे सवाल पूछे जाने की कल्पना तक नहीं की जा सकती। जब हमने अमेरिकन आइडोल की तरह इंडियन आइडोल बनाया, हू वांट टु बी मिलिओनेयर की जग कौन बनेगा करोड़पति बनाया और उसे ऐतिहासिक कामयाबी भी मिली, तो यह सब बहुत आसान था। छोटे-मोटे बदलावों से ही भारतीय संस्करण बन गया था। और कुल मिलाकर वे कार्यक्रम प्रतियोगिता भर थे। लेकिन मोमेंट ऑफ ट्रथ अलग है, यह बहुत बेधड़क है और इसमें सेक्स का तड़का है, इसी वजह से यह चर्चित भी है और 23 देशों में इसका फ्रेंचाइज है, एशिया में यह पहली बार आया है।


लेकिन हिंदी दर्शकों की दिलचस्पी के लिए यह कार्यक्रम कैसे बनाया जा सकता है? ताकि यह बहुत आक्रामक भी न हो और मध्यवर्ग के घरों में पहुंच जए। सिनर्जी के सिद्धार्थ बसु स्वीकार करते हैं कि कार्यक्रम के निर्माता के लिए यह एक चुनौती थी, खासतौर परइसलिए भी कि इसके लाइसेंस का जो समझोता हुआ था, उसके अनुसार इस कार्यक्रम को इसके मूल रूप में ही किया जाना था।ट्रिक यह थी कि मूल भावना को बरकरार रखा जाए और ऐसी कहानी तैयार हो कि उसमें दर्शक डूब जाएं। बजाए इसके कि बेलौससवालों के चक्कर में दर्शक और प्रतिस्पर्धी दोनों को असहज बना दिया जए। इसे ऐसा बनना था कि यह देखने में आक्रामक लगे। यहशो तभी चल सकता था, जब इसकी भाषा और इसका मुहावरा स्थानीय संस्कृति के अनुकूल हो। सबसे मुश्किल काम इस कार्यक्रम का भारतीयकरण ही था। कामयाबी कितनी मिली, यह अभी नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसी हफ्ते यह शुरू हुआ है। लेकिन इसकी कामयाबी यह तो तय करेगी ही भविष्य के रियलिटी शो कैसे होंगे। भारतीय दर्शक अब व्यस्क हो चुके हैं और वे सेक्स के मामले में ज्यादा बिंदास शो देखने के लिए तैयार हैं। अमेरिका में कई दशकों से ऐसे कार्यक्रम चल रहे हैं और रेटिंग में काफी ऊपर जा रहे हैं। जैसे डॉक्टर फिल का टॉक शो है, जिसमें मोटापा कम करने से लेकर वैवाहिक जीवन तक कई विषयों पर बात होती है। इससे भीबिंदास जेरी सिप्रंगर शो है, जिसमें शामिल होने वालों को सार्वजनिक रूप से तरह-तरह की पेरशानी में डाला जता है। यह कार्यक्रम लोकप्रिय भी काफी है। लेकिन लोग ऐसे कार्यक्रम में क्यों भाग लेना चाहते हैं, जिसमें अपनी भावनाओं या नीयत को छुपाने की कोई गुंजइश न हो। एक कारण तो इसमें मिलने वाला भारी इनाम है। साथ ही इससे आम आदमी को मौका मिलता है कि वह 15 मिनट के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हो जए। कारण जो भी हो, लेकिन भारत जसे परंपरावादी देश में भी लोग एक ऐसे बिंदास किस्म केकार्यक्रम में भाग लेने के लिए तैयार हैं, जो उन्हें परेशान करे और उनकी मूर्खता को जगजहिर कर दे। हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां लोग प्रचार के भूखे हैं और उन्हें बस एक मौका चाहिए।
ऐसे कार्यक्रमों में लोग भाग लेते रहेंगे और दर्शक उन्हें देखते भी रहेंगे। आखिर इन चैनलों और लोगों को मनोरंजन के लिए कुछ तोचाहिए ही।

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