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पद्मविभूषण पर कुछ लोगों ने गंदी राजनीति की

कभी रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें नृत्य साम्राज्ञी कहा था। 75 साल से वे कथक नृत्य के शिखर पर हैं। जिंदगी के 90 पड़ाव पार करने के बाद भी सितारा देवी के पांव थमे नहीं हैं। इस उम्र में भी उनमें पहले जैसा ही उत्साह है, पहले की तरह आज भी वे बाकयदा नृत्य के शो करती हैं। आज भी वे पहले की ही तरह निडर और मुंहफट्ट हैं। इसकी वजह से वे विवादों में भी रहीं। सितारा देवी का पूरा जीवन खासा दिलचस्प है। इसलिए उनके पास बोलने और बताने को भी बहुत कुछ है। हाल ही में वे राष्ट्रीय संगीत नाटक अकादमी की ओर से दिए गए सम्मान अकादमी रत्न के सिलसिले में दिल्ली आईं तो उनसे रूबरू हुए रवींद्र मिश्र।

आपकी नृत्य यात्रा कब शुरू हुई?

पांच साल की उम्र में ही मेरा इसमें प्रवेश हो गया था। फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। 12 साल की उम्र में मैने कथक में दक्षता हासिल कर ली थी। मेरा ताल्लुक बनारस घराने से है, सबसे पहले मैंने नृत्य अपने पिता नृत्याचार्य सुखदेव महाराज से सीखा। इसके अलावा लखनऊ घराने के गुरु अच्छन महाराज, लच्छू महाराज और शंभू महाराज से भी इसकी तालीम ली। इसके बाद नृत्य में अपनीमौलिक जगह बनाने के लिए इसे अपना एक अलग अंदाज और रंग दिया। नृत्य से मेरा आत्मिक और जैविक रिश्ता है इसलिए जीवन भर मैं इस नृत्य में खोई रही।

फिल्मों में जाना कैसे हुआ?
यह एक इत्तफाक था। 12 साल की उम्र में मैं जब अपने पिता के साथ बंबई गई तो वहां के लोग मेरा नृत्य देखकर चकित हो गए। नृत्यांग्ना की रूप में मुझे कई फिल्मों के लिए साइन कर लिया। मजे की बात थी कि मुझे एक्टिंग के लिए भी चुन लिया गया। ‘रोटी और वतन’ जैसी कई फिल्मों में मेरी अदाकरी की चर्चा भी काफी हुई। जब मैं बंबई गई थी तो लोग वहां कथक का नाम भी नहीं जानते थे। कुछ समय में ही नामी-गिरामी हीरोइनें मुझसे नृत्य सीखने आने लगीं। मधुबाला, माला सिन्हा, संध्या ऐसे अनगिनत नाम हैं जिन्होंने मुझसे बाकायदा तालीम ली।

आप कपूर परिवार के भी नजदीक रहीं?
न्यू इंडिया थियेटर में मेरी मुलाकात पृथ्वीराज कपूर से हुई तो मेरा उनसे आत्मिक रिश्ता जुड़ गया। उस समय मैं 18 साल की थी, राजकपूर 12 साल का, शम्मी कपूर आठ साल का और शशि कपूर दो साल का था। शशि मेरी गोद में खेलता था। राजकपूर मुझसे बेहद मोहब्बत करता था। यह रिश्ता अंत तक बना रहा। आर. के. स्टूडियो की मशहूर होली मेरे बिना होती ही नहीं थी। उस होली की यादें आज भी दिल में वैसे ही अंकित हैं।

आपने पद्मभूषण पुरस्कार क्यों ठुकरा दिया था?
कुछ लोगों ने मुझसे गंदी राजनीति खेली, मुझे पद्मविभूषण से वंचित रखने के लिए। जबकि मुझसे जूनियर कई लोगों को यह पुरस्कार दिया गया।

ये लोग कौन थे?
नाम मैं नहीं बताऊंगी, आप खुद पता कर लें। इसके पहले जब मुझे पद्मश्री मिला था तो इंदिरा गांधी ने कहा था कि सितारा देवी जैसी विलक्षण कलाकार कहीं बड़ा सम्मान पाने की हकदार है। अगर आज वे जिंदा होती तो शायद मुझे भारत रत्न भी मिल सकता था।

क्या यह सही है कि एक जमाने में बड़े-बड़े तबलावादक आपके साथ संगत करने से घबराते थे?
काफी हद तक सही है। जवानी में मैंने जबर्दस्त रियाज की थी। तब आठ से दस घंटे तक लगातार नृत्य कर सकती थी। मेरे पैरों में बिजली जैसी तरंग थी और गति में अजब तीव्रता। कुछ ही तबला वादक थे, जो मुझसे लोहा ले पाते थे। सामता प्रसाद, किशनमहाराज, जकिर हुसैन जैसे वादक ही मेरे सामने ठहर पाते थे।

इस उम्र में आप इतनी ऊर्जा कहां से पाती हैं?
मैंने पिछले तीस साल से अन्न नहीं खाया। मैं जूस पीती हूं, छाछ पीती हूं, बदाम का हल्वा खाती हूं, पिस्ता, मेवे वगैरह खाती हूं और भगवान का नाम लेती हूं। इसी से सारी ऊर्जा आ जाती है।

कथक में आपकी बनारस शैली किस मायने में लखनऊ और जयपुर की शैली से अलग है?
बनारस और लखनऊ की नृत्य तकनीक में कोई खास फर्क नहीं है। लेकिन बनारस की शैली में अध्यात्म और भक्तिभाव की ज्यादा प्रधानता रहती है। इसमें नृत्य के अभिनय भाव में ज्यादातर पौराणिक कथाए हैं। रामकथा, राधा-कृष्ण प्रसंग से लेकर अनेक भक्तिरचनाओं की प्रस्तुति में बनारस का कथक बहुत श्रेष्ठ है। लखनऊ की शैली काफी विकसित है, लेकिन वहां नृत्य का रूप दरबारी रहा है।

आपके साथ नृत्य की जो विरासत जुड़ी हुई है उसका भविष्य आपको किस तरह दिखाई देता है?
पंडित सुखदेव महाराज की नृत्य विरासत को मेरी दो बड़ी बहनों अलकनंदा और तारा ने मेरे साथ संभाला था। इसके बाद मेरे भांजे गोपी किशन ने इसमें काफी नाम कमाया। मेरी बेटी जयंती माला भी इसमें काफी आगे है। अब तो हमारे नाती पोते इसमें आगे आ रहे हैं। इस लिहाज से भविष्य काफी अच्छा है।

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