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इतिहास से राजनीति के विवाद तक

इतिहास से राजनीति के विवाद तक

रीता बहुगुणा जोशी ऐसी तो न थीं। अपने लोगों के बीच दीदी के नाम से पुकारी जाने वाली जोशी विद्रोहिणी कभी नहीं रहीं। दीदी तोममता बनर्जी को भी कहते हैं। लेकिन ममता दीदी और रीता दीदी में काफी अंतर रहा है। ममता का ओढ़ना-बिछाना विद्रोह और तुनकमिजजी है, जबकि रीता का का गहना उनकी विनम्रता। पिता हेमवती नंदन बहुगुणा भी बागी थे। लेकिन बगावत का उनका गुण बेटी ने नहीं अपनाया। रीता की पहचान उनकी शालीनता है। इसीलिए जब वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती पर हमलावार हुईं तो कहर बरप गया। कोई उनको कोस रहा है, तो कोई उनके बयान को गलत अर्थ में लिए जाने की बात कर रहा है। आम राय यही है कि रीता को किसी महिला नेता के बारे में ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। ऐसा पार्टी की कई महिला सांसद भी कह चुकी हैं। फिलवक्त रीता संकटों से घिरी हैं। उन्हें मायावती ने जेल दिखा दी है। अब उन्हें लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी। हालांकि रीता अपने कहे पर खेद जता चुकी हैं। पूरब का ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रोफेसर रीता बहुगुणा जोशी की जुबानएकैसे फिसल गई इस पर शोध किया जा सकता है। इलाहाबाद में जन्मी रीता 1973 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग में प्रवक्ता के पद पर उनकी नियुक्ति हुई। 1976 में उनकी शादी पूरन चंद्र जोशी से हुई। उनके एक पुत्र हैं।

1982 में उन्होंने मध्यकालीन इतिहास में डी.फिल की उपाधि प्राप्त की। अध्यापन के साथ-साथ वे सामाजिक एवं राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ी रहीं। वे नेशनल काउंसिल ऑफ वूमेन इन इंडिया की राष्ट्रीय महासचिव और अखिल भारतीय महिला कांग्रेस कीराष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी से की। समाजवादी पार्टी के समर्थन से 1996 में वे बतौर निर्दलीय प्रत्याशी इलाहाबाद की प्रथम महिला महापौर निर्वाचित हुईं। इसके बाद वह अखिल भारतीय महापौर परिषद् की कार्यकारिणी की सदस्य तथा उत्तर प्रदेश महापौर परिषद् की महासचिव चुनी गई। समाजवादी पार्टी के टिकट से सुल्तानपुर संसदीय सीट से चुनाव भी लड़ा। हार के बाद 1999 में वे कांग्रेस में शामिल हो गईं। 2004 में इलाहाबाद संसदीय सीट से उन्होंने चुनाव लड़ा। हारीं। फिर 2007 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव इलाहाबाद की दक्षिणी विधानसभा सीट से हारीं। इसके बाद 2009 में उन्होंने लखनऊ संसदीय सीट से एक बार फिर किस्मत अजमाई। इस बार भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। चुनाव में हार रीता की नियति सी बन गई। बावजूद इसके बतौर उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष उनके भाग्य ने उनका साथ दिया। बेशक वे लखनऊ से हार गई हों, लेकिन उनके नेतृत्व में सूबे में मर चुकी कांग्रेस ने जबर्दस्त प्रदर्शन किया। इसी उन्माद में रीता शायद सीमा लांघ गईं। बड़बोली हो गईं। अब जब उन्होंने खेद जता दिया है, तब भी मायावती अपने कदम पीछे खींचती नहीं दिख रहीं।

 

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