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जश्न

जश्न

सितारे : अध्ययन सुमन, अंजना सुखानी, शहाना गोस्वामी और हुमायूं सईद 
निर्माता / बैनर :  मुकेश भट्ट / विशेष फिल्म्स
निर्देशक : रक्षा मिस्त्री और हसनैन एस. हैदराबादवाला
गीत :  कुमार, नोमान जावेद और निलेश मिश्रा
संगीत : तोशी साबरी और शारिब साबरी
संवाद :  शगुफ्ता रफीक
कहानी : आकाश (अध्ययन सुमन) एक गायक है और अपने बैंड के तीन अन्य सदस्यों के साथ संगीत की दुनिया में नाम और शोहरत पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। आकाश की एक बहन भी है निशा (शहाना गोस्वामी), जिसके अमन बजाज (हुमायूं सईद) नामक  एक उद्योगपति से नाजायज संबंध हैं। एक दिन निशा को पता चलता है कि अमन शादीशुदा है, लेकिन वह उसका साथ नहीं छोड़ पाती, क्योंकि अमन के दिये पैसों से ही उसका घर चलता है। ये सब बातें आकाश को भी मालूम हैं। पर वह कुछ नहीं कर सकता। एक दिन आकाश की मुलाकात सारा (अंजना सुखानी) से होती है और देखते ही देखते दोनों को प्यार हो जाता है। जब सारा आकाश और निशा को अपने घरवालों से मिलवाती है तो दोनों यह देखकर दंग रह जाते हैं कि अमन ही सारा का भाई है। अमन और आकाश के बीच हाथापाई होती है, जिसके बाद आकाश घर छोड़कर चला जाता है। उधर, सारा भी अपना घर छोड़कर आकाश के साथ रहने लगती है और आकाश को संगीत के क्षेत्र में कुछ कर दिखाने के लिए प्रेरित करने लगती है। एक दिन आकाश को बैंड की एक संगीत कंपनी काम देने के बारे में सोच ही रही होती है कि उनके रास्ते में अमन आ जाता है। आकाश फिर से दर-दर की ठोकरें खाने लगता है।

निर्देशन : भट्ट कैंप की फिल्में अपनी दमदार कहानी और संगीत के बल पर खेलती हैं, लेकिन ‘जश्न’ को संभालने में निर्देशक रक्षा मिस्त्री और हसनैन एस. हैदराबादवाला की जोड़ी कई जगह लड़खड़या गयी। इस जोड़ी ने कई हिस्सों में कसावट के साथ दर्शकों को बांधने की क्षमता दिखाई है, साथ ही कई खामियों को वह छिपाने में नाकाम भी रहे। इमोशनल पलों में गहराई के साथ संभावनाएं जहां-जहां दिखाई दीं, वहीं वे सितारों से ठीक से काम न ले सके, जैसे कि अध्ययन सुमन का होटल में संघर्ष और शहाना के अकेलेपन की बेबसी।

अभिनय :  चूंकि फिल्म में सितारे ज्यादा नहीं हैं और कहानी में कई भावपूर्ण पल हैं, इस लिहाज से शहाना गोस्वामी ने सबसे अच्छा अभिनय किया है। अपने किरदार को उन्होंने तर्कपूर्ण तरीके से पेश करते हुए उसमें इंटरवल के बाद गजब की वैरायटी दिखाई है। अध्ययन सुमन कुछेक जगह ही ठीक लगे। उनका लुक संघर्षरत संगीतकार के रूप में फिट नहीं बैठता। इन सबके बीच हुमायूं सईद ने नेगेटिव किरदार में अच्छी परफॉरमेंस दी है। अंजना सुखानी के अभिनय में पहले से काफी निखार आया है। 
 
गीत-संगीत :  एक संगीत प्रधान फिल्म होने के नाते संगीत ठीक-ठाक ही है। ‘तेरे बिन’ गीत सुनने में काफी अच्छा है। लेकिन भट्ट कैंप की पिछली फिल्मों की तरह इस फिल्म का संगीत उतना अच्छा नहीं है, जिसे लोग लंबे समय तक याद रख सकें। तोशी-शारिब ने थोड़ी कोशिश तो जरूर की है। 

क्या है खास : शहाना की परफॉरमेंस और क्लाईमैक्स।
क्या है बकवास : अध्ययन सुमन संघर्षरत हैं और पैदल भी, पर अपनी बहन के साथ रहते हैं एक ऐसे बंगले में, जो समुद्र के सामने है और उसमें पूल भी है। इतना अमीर स्ट्रगलर?
पंचलाइन : एक अच्छी कहानी के साथ खिलवाड़ का जश्न।

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