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दो टूक

भक्ति और राजनीति सार्वजनिक जीवन की दो बड़ी सच्चाइयां हैं। लेकिन कभी-कभी वे दोनों ही सार्वजनिक जीवन की दुश्मन भी बन जाती हैं। यकीन न हो तो गाजियाबाद बॉर्डर पर चले आइए। यहां बम भोले का शोर है। अपने लिए स्वर्ग पक्का करने वाले कांवड़ियों का तांता लगा है। लेकिन स्थानीय लोगों का जीवन नरक हो गया है। स्कूल बंद हैं।

यातायात मोड़ दिया गया है और वाहन ठप हैं। रिक्शा-ऑटो वाले दुगने-तिगने दाम मांग रहे हैं। ऊपर से रीता बहुगुणा-मायावती प्रकरण आन पड़ा।  राजनीतिक कार्यकर्ताओं के जत्थे उमड़ने लगे। एहतियात के लिए पुलिस ने जगह-जगह सड़क कब्जा ली। इससे डेली पैसेंजरों का आवागमन और भी दूभर हो गया। हाथियों की लड़ाई में घास पिसने लगी। भक्ति भी अच्छी है, राजनीति भी। लेकिन वे आम आदमी की दिनचर्या से क्यों टकराएं?

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