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एक शहर के अतीत से अन्याय

इस साल के शुरू में मुझे लाहौर जाने का निमंत्रण मिला तो मैं अपने शहर बंगलुरु की किताबों की दुकान पर पहुंच गया, ताकि इस महान और प्राचीन पाकिस्तानी शहर के बारे में कुछ जान सकूं। महात्मा गांधी रोड पर पुरानी किताबों की दुकान पर मुझे मुहम्मद बाकिर की लिखी ‘लाहौर पास्ट एंड प्रजेंट’ मिली। किताब का पहला संस्करण 1952 में प्रकाशित हुआ था, दूसरा 1984 में और जो मुझे मिला वह 1993 में भारत में छापा गया था। सीधे-सादे शीर्षक से लग रहा था कि इसमें शहर की कई सदियों की यात्रा का वर्णन होगा। पहले ही पेज से पता लगा कि लेखक पंजाब (पश्चिमी) विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर रह चुके हैं और लंदनविश्वविद्यालय से उन्होंने एम.ए और पी.एच.डी किया है।

लेकिन आगे देखने पर पता लगा कि ये सारी बातें बेमतलब थीं, क्योंकि किताब इस्लामिक नजरिये से लिखी गई थी। इसमें इस्लाम पूर्व लाहौर पर मात्र 40 पेज थे। इसके बाद शहर के मुसलमान शासकों की उपलब्धियों के लिए 160 पेज। 18वीं सदी से 19वीं सदी की शुरुआत तक लाहौर पर शासन करने वाले सिखों को 18 पेजों में निपटा दिया गया था, इसके बाद आने वाले ब्रिटिश शासकों के  लिए 22 पेज थे। और आखिर में एक बहुत बड़ा हिस्सा 1947 से 1980 के दौर के लिए था। इन्हीं की कुछ बातें मैं यहां रख रहा हूं।
‘वृहस्पतिवार, 9 मार्च 1950 का दिन लाहौर के लिए एक महत्वपूर्ण दिन था, इस दिन ईरान के शाह मुहम्मद रजा पहलवी नेपाकिस्तान की फौजी ताकत, कला प्रतिभा, संगीत, शिक्षा संस्थानों और शाहजहां के खूबसूरत शालीमार बाग का जायजा लिया। उन्होंने राजकीय भोज और उसके बाद हुए स्वागत में शिरकत की।’
‘वृहस्पतिवार, 10 मार्च 1955 को जॉर्डन के किंग हुसैन ने पाकिस्तान के निर्माण के लिए संघर्ष करने वालों को श्रद्धांजलि दी। शालीमार गार्डन में हुए नागरिक सम्मान में उन्होंने पाकिस्तान को मुसलमानों का गौरव और शान बताया और कहा कि यह इस्लाम का मजबूत गढ़ है।’
‘पंजाब विश्वविद्यालय ने अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक सम्मेलन का आयोजन किया। 29 दिसंबर 1957 से 8 जनवरी 1958 तक हुआ यह सम्मेलन किसी भी एशियाई देश में अपने तरह का पहला आयोजन था। निम्नलिखित (32) देशों के 170 प्रतिनिधियों ने इसमें हिस्सा लिया’। ‘शनिवार 22 फरवरी 1975 को प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने लाहौर में दूसरे इस्लामिक सम्मेलन के स्मारक की नींव के पत्थर का अनावरण किया।’
‘शुक्रवार (1, जुलाई 1977) को एक ओर ब्रिटिश विरासत से मुक्ति पा ली गई, जब यह घोषणा हुई कि पूरे देश में अब शुक्रवार को साप्ताहिक अवकाश रहेगा।
इससे 128 साल से चली आ रही औपनिवेशिक परंपरा खत्म हो गई। इसकी शुरुआत आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के पतन के बाद हुई थी। - इस इस्लामी तरीके को फिर से लागू करना मुस्लिम विश्व से पाकिस्तान के लगाव का प्रतीक है।’
‘प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने 22 फरवरी 1977 को इस्लामिक समिट मीनार का उद्घाटन किया। यह स्मारक पाकिस्तान में तीन साल पहले हुए उस ऐतिहासिक सम्मेलन की याद में बनाया गया है, जिसमें 40 इस्लामी देशों ने हिस्सा लिया था। इस 48 मीटर ऊंची सफेद संगमरमर की मीनार में इस्लामिक भाईचारे की भावना झलकती है’।
इस किताब का पूरा मकसद और संदेश पाकिस्तान डे मेमोरियल में झलकता है। 1960 में मिंटो पार्क में बना यह स्मारक दो दशक पहले के उस दिन को याद करने के लिए है, जब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान बनाने का प्रस्ताव पास किया था। लंदन में पढ़े हमारे इस इतिहासकार की शिकायत यह है कि इस स्मारक के लिए शुरू में धन जमा करने का जो प्रयास चला था उस पर लोगों की प्रतिक्रिया गर्मजोशी भरी नहीं रही, ‘जनता में इस मामले में जिस तरह से भावना की कमी है, वह काफी निराश करने वाली है।’ बाद में पंजाब सरकार ने इसके लिए सिनेमा टिकट पर पांच पैसे और रेस टिकट पर 50 पैसे का अधिभार लगा दिया। ‘इस सरकारीप्रयास से परियोजना का वित्तीय संकट हल हो गया।’
यह स्मारक 1968 में पूरा हुआ। इसका स्तंभ बादशाही मस्जिद के सामने है। लेखक ने इसका वर्णन कुछ इस तरह किया है, ‘आधार और पहले चार प्लेटफॉर्म का डिजाइन पाकिस्तान आंदोलन के इतिहास को विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से दिखाने के लिए किया गया है। इसमें अनगढ़ पत्थरों को अनियमित ढंग से लगाया गया है, जो यह बताते हैं कि भारतीय मुसलमानों ने जब अपनी आजादी का आंदोलन शुरू किया तो उसमें दिशा का आभाव था। पहले प्लेटफॉर्म के लिए अनगढ़ तक्षशिला पत्थर इस्तेमाल हुएहैं। दूसरे प्लेटफार्म के लिए खुरदरे भारी पत्थरों का इस्तेमाल हुआ है। तीसरे प्लेटफॉर्म के लिए कम तराशे पत्थर इस्तेमाल हुए हैं और चौथा प्लेटफॉर्म चमकदार संगमरमर से बना है, जो आजादी और पाकिस्तान के वैभव का प्रतीक है।’
अगर एक बाकायदा शिक्षित-प्रशिक्षित इतिहासकार इसे संकीर्ण सांप्रदायिक ढंग से लिखता है तो यह सिर्फ इतिहास के व्यवसाय का ही अपमान है। साथ ही यह उस महान, प्राचीन और बहुसांस्कृतिक शहर का भी अपमान है, जहां के ये इतिहासकार महोदय रहनेवाले हैं। कोई भी यह उम्मीद करेगा कि प्रोफेसर मुहम्मद बकीर को कुछ न्याय उन हिंदुओं और सिखों से भी करना चाहिए, जो 1947 में यहां से बेदखल किए जाने तक लाहौर की संगीत, साहित्य और खान-पान में भारी योगदान दे चुके थे। वैसे यह किताब हमें साहित्य और संगीत में मुसलमानों के योगदान के बारे में भी कुछ नहीं बताती। एक ज्यादा संवेदनशील इतिहासकार हमें इस शहर की सामाजिक आर्थिक जिंदगी के बारे में बताता, वहां के विभिन्न तबकों के बारे में बताता, फौज के बारे में, शहर के गरीबों के बारे में बताता। लेकिन यहां तो सारी मेहनत इस्लामी देशों से शहर में आने वाले शासकों और सरकार की धार्मिक विचारधारा पर ही की गई है।
शुक्रवार की जिस छुट्टी को लेखक ने इस्लामी तरीके की वापसी बताया है, उसे जुल्फिकार अली भुट्टो ने लागू किया था जो धर्मनिरपेक्ष माने जाते थे। 1947 के हादसों के बावजूद लाहौर एक अद्भुत शहर है, जिसमें एक सामाजिक गहराई है। इसे एक ऐसे इतिहासकार का इंतजार है, जो इसके अतीत की जटिलताओं से न्याय कर सके। जरूरी नहीं है कि उसने किसी पश्चिमी विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल की हो, जरूरी है कि वह इस शहर में अच्छी तरह घूम सके, अभिलेखागार के कम रोशनी वाले कमरों में वक्त गुजार सके और जिसकी दिलचस्पी आम आदमी की जिंदगी को जानने में हो। जो अर्थव्यवस्था और राजनीति से आगे बढ़कर समाज और संस्कृति में झांके।

ramguha@vsnl.com
लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार हैं

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