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बुरा मानो या भला : हम सब जानते हैं, लेकिन

मैं छुट्टियां मना रहा था। तभी बाबरी मस्जिद पर जस्टिस लिब्रहान ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी। लिब्रहान पर कुछ भी कहने में देर हो गई है। लेकिन मैं अपने को रोक नहीं पा रहा हूं। सो, कभी नहीं से देरी भली। सबसे पहले तो मैं लिब्रहान को शुक्रिया अदा करना चाहता हूं। आखिर उन्होंने 17 साल और आठ करोड़ रुपए खर्च करके रिपोर्ट दे ही दी।

वह ऐसी जांच कर रहे थे, जिसे लाखों लोगों ने टीवी पर देखा था। उसमें कुछ भी छिपा हुआ नहीं था। हम जानते हैं कि सोमनाथ से अयोध्या की रथ यात्रा करते हुए आडवाणी ने माहौल को बिगाड़ा था। हम जानते हैं कि जहां कभी मस्जिद थी, वहां मंदिर बनाने के लिए देश भर से डिजाइनर ईटें आई थीं। जाहिर है उसके लिए मस्जिद को ढहाना ही था। हम जानते हैं कि कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने प्रधानमंत्री को भरोसा दिलाया था कि मस्जिद को कोई छू भी नहीं पाएगा। वह तब झूठ बोल रहे थे। वह आज भी झूठ बोल रहे हैं। उनका कहना है कि मस्जिद का ढहाया जाना भगवान का काम था। ऐसा नहीं था। वह आदमी के खोल में शैतान का काम था। वे लोग पूरी तैयारी के साथ आए थे। आरएसएस, शिवसेना, बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद् से जुड़े हुए थे। वहां जो भी पुलिस वाले थे, वे लाठी तक नहीं उठा रहे थे। हमने देखा था कि ‘काम’ होते ही उमा भारती ने मुरली मनोहर जोशी सेगले मिलकर सेलिब्रेट किया था। प्रधानमंत्री नरसिंह राव तो कुछ नहीं करने के लिए मशहूर थे। वह कुछ न करने की कला में भरोसा करते थे। वहां जब ये सब हो रहा था, उन्होंने सिर्फ इतना किया कि कल्याण सिंह को बर्खास्त कर दिया। लिब्रहान की उस रिपोर्ट केबाद अब क्या होगा? उस रिपोर्ट पर आगे कोई भी कार्रवाई प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृह मंत्री चिदंबरम और कांग्रेस पार्टी की सिफारिशों पर ही होनी है। जहां तक इंसाफ की बात है, उस जुर्म को करने वालों को जेल में डालना चाहिए। लेकिन वैसा करनाराजनीतिक लिहाज से ठीक नहीं होगा। अपने देश में ऐसा होने से विलेन भी हीरो बन जाते हैं। अच्छा तो यह होगा कि संसद में एक प्रस्ताव पास कर उस घटना पर गहरा अफसोस जाहिर किया जाए। और यह भरोसा दिलाया जाए कि फिर कभी वैसा नहीं होगा।

मां और बेटी

दिल्ली में सैकडों स्कूल हैं। उनमें से छह खुद को राजधानी और देश का बेहतरीन मानते हैं। ये सभी बेहतर नतीजों की गवाही देते हैं। अपने यहां से निकली मशहूर हस्तियों के बारे में भी बताते रहते हैं। मैं उनके दावों की सच्चाई तो नहीं जान सकता। लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि उनमें दाखिला बेहद मुश्किल होता है।
कुछ तो जबर्दस्त डोनेशन मांगते हैं। और घपलों की कहानियां सुनने को मिलती ही रहती हैं। खैर, मैं इतना जानता हूं कि हिंदुस्तानी सरकार ने एक स्कूल प्रिंसीपल को ही सम्मानित किया है। वह हैं श्यामा चोना। वह डीपीएस, आर.के. पुरम की प्रिंसीपल हैं।पिछले साल उन्हें पद्म भूषण मिला था। वह 1964 से इसी स्कूल में हैं। कई विस्तार के बाद वह आखिरकार अगले महीने रिटायर हो रही हैं। श्यामा चोना जयपुर के महारानी गायत्री देवी स्कूल और कॉलेज में पढ़ी हैं। उनके पति रिटायर्ड मेजर जनरल हैं। दो बेटियां हैं। मैं उनकी इज्जत एक अलग जज्बे के लिए करता हूं। उनकी एक बेटी तमन्ना विकलांग थी। नौ साल तक वह कुछ भी ठीक से नहीं बोल पाती थी। बिना मदद के चल नहीं पाती थी। पहली बार मैं उससे कसौली में अपने घर पर मिला था। वह अब भी टीनएजर है। कुछ दिक्कत उसे जरूर बोलने में होती है। लेकिन खूब बात करती है। खुद ही चल लेती है। उससे भी बड़ी बात है कि वह अपने नामपर तमन्ना स्कूल चला रही है। उसमें खास तरह की परेशानियां झेल रहे बच्चों को पढ़ाया जाता है। मैंने अपने भाई-बहनों को परिवारके चैरिटेबल ट्रस्ट से एक ब्लॉक उसे देने के लिए मनाया था। एक बार लेडी डायना ने भी उस स्कूल का दौरा किया था। अक्सर श्यामा से मेरी मुलाकात दिल्ली पब्लिक स्कूल सोसाइटी की सालाना बैठक में होती है। सालों से वह सोसाइटी गुटों में बंटी हुई है। उसके चेयरमैन, प्रेजीडेंट और सेक्रेटरी बनने के लिए उठापटक होती रहती है। वहां की बैठकों में वह चुप ही रहती हैं। लगता है आंख बंद किए हैं। उन्हें और बड़े काम करने होते हैं। श्यामा चोना जैसी शख्सीयत कभी रिटायर नहीं होतीं। मुझे उम्मीद है कि वह शिक्षा के क्षेत्र में कुछ न कुछ करती रहेंगी।   

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