अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

तब बैकुंठ भी नहीं ..

अपने आखिरी समय में संत नामदेव पंढरपुर लौट आए थे। वह अस्सी साल के हो गए थे। उनकी चाहत थी कि पंढरीनाथ के चरणों में ही उनकी सांस निकले। और वहीं कहीं वह रम जाएं। कहते हैं कि उन्हें खुद भगवान विष्णु लेने आए थे। वह पंढरपुर में थे। अपनेविट्ठल के मंदिर में। लेकिन वह कहीं नहीं जाना चाहते थे। बैकुंठ में भी नहीं। वह इसी दुनिया में अपने विट्ठल के मंदिर में रहना चाहते थे। वह मंदिर ही उनके लिए बैकुंठ था। यहीं उन्हें अपने हरि मिले थे। उन्होंने अपने बिठोबा के सामने ही आखिरी सांस ली। जिस सीढ़ी पर प्रार्थना करते हुए उन्होंने प्राण छोड़े थे, वहीं उनकी समाधि बना दी गई। संत नामदेव ने इच्छा जाहिर की थी- ‘बैकुंठासी आम्हा नको धाडमू हरि। वास दे पंढरी सर्वकाल।’
हे विट्ठल, हमें बैकुंठ मत भेजो। पंढरपुर में ही सदा रहने दो। पंढरपुर ही बैकुंठपुर है। वैकुंठ में क्या धरा है? मुझे तो अपने ही चरणों में जगह दो।
संत नामदेव भक्त थे। पंढरपुर में ही उनका अपने बिठोबा से मिलन हुआ था। वह वहां से कहीं नहीं जाना चाहते थे। प्रभु लेने आए, तब भी नहीं। वह अपने प्रभु के चरणों में रहना चाहते थे। वही उनका जीवन है। वही मुक्ति है। वही मोक्ष है। बैकुंठ तक की कोई इच्छानहीं! बैकुंठ तो वह जाए, जिसे दुनिया से कोई शिकायत हो। भक्त को कोई शिकायत कहां होती है? वह तो हर चीज को प्रभु कीइच्छा मानता है। उस प्रभु इच्छा के आगे नतमस्तक होता है। वह संसार को प्रभु का प्रसाद ही मानता है न। अगर संसार प्रभु का प्रसाद है, तो फिर काहे बात की शिकवा-शिकायत।

दक्षिण के महान संत नीलकंठ दीक्षितर ने अपनी आंखें खो दी थीं। वह मां मीनाक्षी की प्रार्थना करते रहे। उन्हीं के लिए पद लिखते रहे। मन की आंखें उनके लिए काफी थीं। देवी के सिवाय कुछ और देखने की इच्छा ही नहीं बची थी। अपने सूरदास की तरह उन्हें कोई गिला-शिकवा नहीं था। हमेशा आनंद में ही रहते थे। रमण महर्षि तिरुवनमलई में रहे। वह कहीं नहीं जाना चाहते थे। उन्होंने परम को पा लिया था। तब उन्हें कहीं और जाने की इच्छा क्यों होती!

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:तब बैकुंठ भी नहीं ..