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राजनीति का मुआवजा!

‘संयम’ की आंखें नम हैं। वो दसियों साल से विस्थापन की मार झेल रहा है। राजनीति की जरूरत बता एक बार किसी नेता ने उससे जगह खाली करवाई थी, मगर तब से उसे न मुआवजा मिला, न मकान। वो न जाने कब से राजनीति की चौखट पर ‘अंदर आ जाओ’ सुनने की उम्मीद में बैठा है। इस बीच बहुतों ने समझाया कि व्यर्थ का आशावाद मत पालो। तुम ‘आउट ऑफ फैशन’ हो गए हो। मगर वो नहीं मानता। उसे लगता है कि वो तो संस्कारों का हिस्सा है और संस्कार कभी आउट ऑफ फैशन नहीं होते।

‘संयम’ का विश्वास अपनी जगह है, मगर मुझे भी लगने लगा है कि संस्कार कहीं ‘आउट ऑफ फैशन’ ही तो नहीं हो गए। ‘संयम’और ‘शुचिता’ कहीं सत्तर के दशक की बैल बॉटम तो नहीं हो गई जिसका ट्रेंड अब नहीं रहा। फिर सोचता हूं कि शायद ये अलग-अलग सभ्यताओं की एक पैमाने पर तुलना जैसा है। मसलन, निर्वस्त्र रहना सभ्य समाज में बुरा माना जा सकता है, मगर कई आदिवासी समाजों में नहीं। और जिस तरह ‘पहनावा’ सभ्यता से जुड़ा है, उसी तरह ‘भाषायी संस्कार’ भी। गाली देना सभ्य समाज में बुरा हो सकता है, मगर राजनीतिक समाज में नहीं। मतलब तो भावनाओं के इजहार से है। किसी विद्वान ने कहा भी है कि‘अभिव्यक्ति’ आपके एहसास की सर्वोत्तम वेशभूषा है। अब ये हमारा दोष है अगर हमें उस वेशभूषा में फटा नजर आता है, उस पर गंदगी दिखती है। यहां एक का वजूद, दूसरे के विनाश पर टिका है, इसलिए भाषा के मर्तबान में मिठास कैसे हो सकती है?
अब कोई इजराइली आप से शिकायत करे कि आप हिंदी में क्यों बात करते हैं, हिब्रू में क्यों नहीं, तो आप क्या कहेंगे? यही ना कि भाई, हिब्रू तुम्हें आती होगी, हमें नहीं, हम तो हिंदी जानते हैं, उसी में बात करेंगे। इसलिए जब कोई एक नेता विशेष किसी दूसरे से बात करे तो आप बुरा न मानें कि वो हिब्रू में बात क्यों कर रहे हैं। अरे भाई, राजनीतिक प्रदेश की यही भाषा है। रही बात इस भाषा के अभद्र होने की तो इस पर मेरी अलग सोच है। विज्ञान कहता है कि आदमी मूलत: जानवर है, मगर वो इंसान होने की कोशिश करता है।

ऐसे में अगर आपको नेताओं की हरकतें और बातें गैर इंसानी लगती हैं तो उसका यही अर्थ है कि इन लोगों ने अपने मूल के प्रति आत्मसमर्पण कर दिया है। पर अफसोस... यही लोग राजनीति के प्रतिनिधि भी हैं, और गुनाहगार भी़... आखिर राजनीति मुआवजा मांगे भी तो किससे? उसके लिए तो एक करोड़ भी कम हैं!

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