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वार्ता का सच

अमेरिका चाहता है कि भारत और पाकिस्तान के संबंध एक हद से ज्यादा न बिगड़ें और अगर आतंकवाद को दोनों की साझा समस्या बता कर उस पर कार्रवाई की बाध्यता न रखी जाए तो इस उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकता है। शर्म-अल-शेख में भारत और पाक के प्रधानमंत्रियों की वार्ता के बाद जो साझा बयान जारी हुआ है, उसका यही अर्थ निकलता है। आतंकवाद को अमेरिका अपनी नजर से देखता है या फिर पाकिस्तान की नजर से, वह उसे भारत की नजर से देखने को उत्सुक नहीं है। बल्कि इस वार्ता में पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के उस बयान का असर भी नहीं दिखा कि पाकिस्तान सरकार ने नीति के स्तर पर आतंकवाद को बढ़ावा दिया। अगर ऐसा होता तो पाकिस्तान की तरफ से मुंबई के हमले के आतंकियों पर कार्रवाई का कोई आश्वासन मिलता या पहले की तरह यह तो कहा जाता कि वह अपनी जमीन का भारत के खिलाफ आतंकी कार्रवाइयों के लिए इस्तेमाल नहीं होने देगा। इसके पीछे पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति की वह छाया भी दिखाई पड़ती है, जो मुंबई पर आतंकी हमले के बाद जरदारी और गिलानी के बीच चल रही है। जरदारी की उदारता उन्हें देश के भीतर कमजोर कर रही है और गिलानी की राजनयिक चतुराई उनकी ताकत बढ़ा रही है। भारत अगर साझा बयान में कश्मीर का जिक्र न होने को अपनी उपलब्धि मान सकता है तो पाकिस्तान बलूचिस्तान की गड़बड़ियों की जांच को अपनी। वह अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी को शुरू से नापसंद करता रहा है और इस बहाने रोकने के उपाय करेगा।


एक तरह से इस वार्ता के परिणाम 2006 के सितंबर में हवाना में मनमोहन सिंह और परवेज मुशर्रफ के बीच वार्ता शुरू करने के लिए हुए समझौते जैसे ही लग रहे हैं। तब भी मुंबई की ट्रेनों पर हमले के बाद वार्ताएं बंद हो गई थीं। पर आज नई अंतरराष्ट्रीय स्थितियों के चलते भारत-पाक के बीच राजनय के नियम बदल रहे हैं।
हमें ध्यान रखना चाहिए कि उस समय के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश भारत के साथ परमाणु समझौता करते हुए रियायतें दे रहे थे, लेकिन नए राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत पर एनपीटी और सीटीबीटी दोनों संधियों पर हस्ताक्षर का दबाव बना रहे हैं। भारत के दौरे पर आ रही विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने यह संकेत दे भी दिए हैं। इन स्थितियों में  पाकिस्तान से अलग भारत की असली ताकत उसकीराजनीतिक और आर्थिक स्थिरता है। इसी मजबूत जमीन पर खड़े होकर हमारे प्रधानमंत्री भारतीय हितों की रक्षा कर सकते हैं।

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