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पैसे के बल पर

उच्च शिक्षा अब ज्यादा से ज्यादा निजी हाथों में जाएगी, यह लगभग तय है। इसे लेकर नैतिक आपत्तियों का कोई अर्थ नहीं हैं, क्योंकि हमें भविष्य के लिए जिस पैमाने पर शिक्षित नौजवानों की फौज चाहिए, उनकी पढ़ाई-लिखाई के लायक संसाधन सरकार के पास नहीं हैं। फिर यह धारणा भी बन रही है कि सरकार उच्च शिक्षा में धन लगाने के बजाए पहले सर्वशिक्षा जैसी मूलभूत चीजों पर ध्यान दे, और बाकी उच्च शिक्षा के लिए इस तरह के नियम कायदे और नियामक तैयार करे कि शिक्षा की गुणवत्ता सुधरे। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) के आला अधिकारी जिस तरह तकनीकी संस्थान को मान्यता देने के लिए रिश्वत लेते हुए पकड़े गए, उसने इस राह के खतरों को भी सामने खड़ा कर दिया है। एआईसीटीई तकनीकी और व्यवसायिक पाठय़क्रमों वाले संस्थानों को मान्यता देती है। उसकी भूमिका नियामक की भी है। उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह अच्छी तरह ठोक-बजाकर और परखकर संस्थानों को मान्यता देगी, ताकि वहां से शिक्षा हासिल करने वाले नौजवानों में कोई कमी न रहे। पैसे लेकर मान्यता दिए जाने की बातें पहले भी कही जाती रही हैं, लेकिन यह पहला मौका है, जब किसी नियामक के आला अधिकारी रंगे हाथ पकड़े गए हैं।

जाहिर है कि पैसे देकर मान्यता हासिल करने वाले संस्थान की प्राथमिकता सूची में शिक्षा की गुणवत्ता नहीं घूस देने के लिए पैसे का जुगाड़ ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। जब भी ऐसे भ्रष्टाचार की बात आती है तो अक्सर यह कर हाथ झाड़ लिए जाते हैं कि भ्रष्टाचार तो हर जगह है। यह ग्लोबल फिनामिना है, क्या करें? लेकिन कुछ तो करना ही होगा, क्योंकि इस तरह से यह भ्रष्टाचार हमारा पूरा भविष्य ही चौपट कर देगा। हम ज्ञान आधारित समाज बनाना चाहते हैं, ऐसे तो भ्रष्टाचार आधारित समाज ही बनेगा। ऐसा नहीं है कि घूस देकर मान्यता हासिल करने की यह पहली घटना होगी, ऐसे कई और मामले होंगे जो प्रकाश में नहीं आ सके। इसका यह अर्थ भी नहीं है कि सभी संस्थानों को मान्यता ऐसे ही मिली होगी और सभी की गुणवत्ता खराब है। लेकिन एक मामले का सामने आना सभी पर शक तो पैदा करता ही है। इसलिए फिलहाल जरूरी है कि शिक्षा के सभी नियामकों की व्यवस्था का पुनर्गठन हो और इनके काम पर निगरानी की समानांतर व्यवस्था भी बनाई जाए।

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