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किम की सेहत बनाम द. एशिया का भविष्य

आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान और अफगानिस्तान में जोर-शोर से जारी अमेरिका की जंग उत्तर कोरिया के बहाने से पूरे एशिया को अपनी चपेट में ले सकती है। उत्तर कोरिया के खानदानी कम्युनिस्ट तानाशाह किम जोंग-इल के मृत्युशया पर होने की जो अपुष्ट खबर हाल में दक्षिण कोरिया से आई है, कम से कम उससे तो यही लगता है। रहस्यमय व्यक्तित्व वाले किम जोंग-इल की सेहत को लेकर लगाई ज रही अटकलों, इस खबर के प्रसारण के पीछे  की मंशा और उत्तर कोरिया को लेकर पश्चिम की कूटनीतिक चालों की टोह ले रहे हैं चंद्रकांत चंद्रमौलि


आतंकवाद के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय लड़ाई छेड़ने का दावा करने वाले (और साम्यवाद के  कट्टर विरोधी) पश्चिमी देशों के खेमे, खासकर अमेरिका की आजकल बांछें खिली हुई हैं। इसकी वजह है उसके खास दोस्त दक्षिण कोरिया के टीवी नेटवर्क वाईटीएन की ये ताजा खबर कि एटमी ताकत से लैस उत्तर कोरिया के कम्युनिस्ट तानाशाह किम जोंग-इल की मौत नजदीक है। वाईटीएन की मानें, तो किम को अग्नाशय का कैंसर हो गया है, जिसके केवल पांच फीसदी मरीज ही ज्यादा से ज्यादा पांच साल के मेहमान रह जाते हैं। लेकिन उत्तर कोरिया का सरकारी मीडिया इसे बकवास बताकर लगातार ऐसे फुटेज दिखाए जी रहा है, जिनमें किम जोंग-इल देश के मजदूर तबके का पुरसा हाल लेने के लिए हर रोज दूरदराज के कल-कारखानों के दौरे कर रहे हैं।

कोरियाई एटम बम का डर

दरअसल, न्यूक्लियर पावर के मसले पर अब तक किम को दबाव में लेने में नाकाम रहे अमेरिका की दिलचस्पी की ये खबर ऐसे मौके पर आई है, जब उ. कोरिया के एटमी हथियारों के खतरे से निपटने के बारे में सोल में छह पक्षीय अंतर्राष्ट्रीय बातचीत का दौर चल रहा है। हाल में रूस, अमेरिका और जपान का दौरा करके लौटे चीन के उप-विदेश मंत्री वू दावेई इस बारे में उत्तर और दक्षिण कोरिया के नुमाइंदों के साथ बातचीत कर रहे हैं। द. कोरिया और अमेरिका उम्मीद लगाए बैठे हैं कि किम के न रहने पर उ. कोरिया कमजोरपड़ जाएगा, और उस पर अंकुश लगाने में आसानी रहेगी। वे उ. कोरिया को अपने एटमी जखीरे की अंतर्राष्ट्रीय जांच के लिए मजबूर करना चाहते हैं, लेकिन चीन चट्टान बनकर उसके साथ खड़ा हुआ है। पिछले साल उत्तर कोरिया ने अमेरिका से साफ-साफ कह दिया था कि वह किसी को अपने एटमी प्रोग्राम की जांच करने की इजाजत नहीं देगा। तभी से अमेरिका उस पर आंखें तरेरता रहा है। यही नहीं, एटमी और मिसाइल टेस्ट के कारण संयुक्त राष्ट्र ने उत्तर कोरिया पर कड़े प्रतिबंध भी लगा रखे हैं। 

‘दुष्ट देश’ का बीमार तानाशाह

उत्तर कोरिया को आठ महीने पहले तक तब के जोशीले अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ‘एक्सिस ऑफ इविल’ यानी आतंक और खौफ़ जैसी पूरी दुनिया की तमाम बुराइयों और बीमारियों की जड़ घोषित करके उसी तरह तबाह कर देने की कसमें खाया करते थे, जैसे उन्होंने इराक का एक तरह से सत्यानाश करके रख दिया है। बुश सरेआम कहा करते थे कि उनकी हां में हां मिलाने से इनकार करने वाले सद्दाम, किम और ईरान के अहमदीनेजद इस दुनिया के असली खलनायक हैं। बहरहाल, किम जोंग-इल की जानलेवा बीमारी को लेकर अटकलों का बाजार काफी गर्म है। पिछले साल भी ओलंपिक मशाल के प्योंगयांग आने और मुल्क की स्थापना की 60वीं सालगिरह के समारोहों में किम की गैरहाजिरी से बाकी दुनिया में उनकी सेहत को लेकर तरह-तरह की आशंकाएं जाहिर की जाने लगी थीं।  
किम जोंग-इल की मरणासन्न अवस्था का पता तब चला, जब वे करीब एक साल बाद पहली बार, पिछले हफ्ते अपने मरहूम पिता और उत्तर कोरिया के संस्थापक तथा ‘सनातन राष्ट्रपति’ किम इल-सुंग की 15वीं बरसी पर सार्वजनिक तौर पर सरकारी टीवी पर नजर आए। 68 साल के किम को देख कर लगा कि वे बिलकुल बेजान हो चुके हैं, उनके बाल तेजी से गिर रहे हैं, वे लंगड़ा करचलते हैं और उनके होंठ तब भी थरथराते रहते हैं, जब वे बोलते नहीं और मुंह बंद ही रखना चाहते हैं।
औपचारिक तौर पर राष्ट्रीय रक्षा आयोग के अध्यक्ष और वर्कर्स पार्टी ऑफ कोरिया के महासचिव का पद संभालने वाले उत्तर कोरिया के सर्वशक्तिमान नेता किम की यह हालत देखकर ही शायद वाईटीएन ने खुफिया एजेंसियों की पुष्टि के बगैर ही, उनको कैंसर होने की खबर प्रसारित कर दी है। पिछले साल अगस्त में दिल का दौरा पड़ने के बाद किम करीब दो महीने के लिए ओझल हो गए थे और चीन से आए डॉक्टरों ने उन्हें बड़ी मुश्किल से जीवनदान दिया था। तब से सरकारी टीवी मीडिया किम के फैक्ट्री दौरों के फोटो रिलीज करके ये साबित करने की कोशिश करता रहा है कि वे बिलकुल फिट हैं। लेकिन उनका लाइव फुटेज गत आठ जुलाई को ही देखने को मिला।

पश्चिम ने तो मार ही दिया था

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि उत्तर कोरिया के कम्युनिस्ट खानदानी तानाशाह किम जोंग-इल को हिलाने और झुकाने के लिए उनकी सेहत और फिटनेस पर सवाल उठाकर उन्हें वहां की गरीब जनता की नजरों में देश के लिए अनुपयोगी साबित करने की कोशिश की गई हो। किम की सेहत को लेकर द.  कोरिया और जापान से लेकर अमेरिका तक के मीडिया में समय-समय पर निगेटिव खबरें आती रहती हैं। विदेशी मीडिया अब तक उनके हार्ट, डायबिटीज, ब्रेन हेमरेज और बार-बार अचेत हो जाने कीबीमारियों की गिरफ्त में आ जाने के दावे कर चुका है।
पिछले साल तो बीजिंग स्थित दक्षिण कोरियाई दूतावास ने ऐसी खुफिया रिपोर्ट मिलने का दावा कर दिया था कि किम की मौत हो चुकी है। जापान के फुजी टीवी ने तो यहां तक दावा कर दिया था कि किम को बचाने के लिए उनका सबसे बड़ा बेटा किम जोंग-नाम खुद फ्रांस जाकर एक न्यूरोसजर्न को लेकर चीन होते हुए प्योंगयांग आया था। लेकिन फ्रांस के ही एक अखबार ने इस खबर को गलत बता दिया था। जापान और अमेरिका में प्रमुखता के साथ किम की मौत की खबरें छपने के बाद बीबीसी ने उत्तर कोरिया की तरफ से जारी खंडन और उसकी ये स्वीकारोक्ति भी प्रसारित की कि किम को दिल का दौरा जरूर पड़ा है।

किम के बाद कौन?

किम की बिगड़ती सेहत की खबरों का असर उ. कोरिया की अवाम और शासन तंत्र दोनों पर एक हद तक जरूर पड़ता है। जानकार बताते हैं कि कम्युनिस्ट सिस्टम में नेता की खराब सेहत का पता चलने के बाद पार्टी का असंतुष्ट खेमा और सैनिक ताकतें उससे पिंड छुड़ाने की कोशिश में जुट जाती हैं। लेकिन ये खबरें गलत साबित होती नजर आए, तो पूरा सिस्टम नेता के साथ आ खड़ा होता है।साठ साल पहले उ. कोरिया की स्थापना के समय से ही वहां कम्युनिस्ट राज के पूरे ढांचे पर किम इल-सुंग और उनके परिवार कीमजबूत पकड़ रही है, और इसीलिए उनके बेटे किम जोंग-इल की सेहत को लेकर उठने वाले तमाम सवालों को बगैर देर किए खत्मकरने की कोशिशें की जा रही हैं। गत अप्रैल-मई में किए गए मिसाइल और एटमी परीक्षण इसी नजर से देखे जा रहे हैं।
किम जोंग-इल के उत्तराधिकारी के बारे में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा तो नहीं की गई है, लेकिन वेस्टर्न मीडिया को लगता है कि किम अपने तीन बेटों और दामाद में से सबसे छोटे बेटे किम जोंग-उन को ही सत्ता की बागडोर सौंपना चाहते हैं। 26 साल के किम जोंग-उन की शक्ल-सूरत, चाल-ढाल और सोच-विचार की उग्र शैली बिलकुल अपने पिता जैसी ही है, और पार्टी के वर्कर उसे ‘ब्रिलिएंट कॉमरेड’ के नाम से पुकारते हैं। किम के सबसे बड़े बेटे किम जोंग-नाम का नाम उत्तराधिकार से इसलिए बाहर हो चुका है कि 2001 में उसे तोक्यो एयरपोर्ट पर फर्जी पासपोर्ट पर हवाई सफर करते पकड़ लिया गया था। वैसे एक खबर ये भी है कि किम अपने दूसरे बेटे किम जोंग-चुल को लीडर के तौर पर सामने लाने के लिए ट्रेनिंग दे रहे हैं, लेकिन इस पर यकीन करने वाला तबका काफी छोटा है। उधर किम के साले जंग सोंग-थक को 2012 का इंतजार है, जब किम के उत्तराधिकारी का औपचारिक ऐलान होगा। अगर फैसला किम के किसी बेटे के हक में गया, तो उसे थक की चुनौती का सामना भी करना पड़ेगा।
अगर किम जोंग-इल की मौत जल्दी हो गई, तो किम जोंग-उन और थक के बीच तीखा सत्ता संघर्ष छिड़ सकता है। जोंग-उन कीउम्र और तजुर्बे की कमी से पार्टी का बड़ा तबका थक के साथ भी जा सकता है। या फिर कट्टर कम्युनिस्ट सैनिक ताकतें तख्तापलटकर सत्ता पर काबिज हो सकती हैं। अगर सेना ऐसा न कर पाई, तो आर्थिक तौर पर पहले से खोखले हो चुके देश में नेतृत्व कासंकट खड़ा होने से इसके वजूद को ही खतरा हो सकता है। इसमें कोई दोराय नहीं कि मंदी और आतंकवाद से घायल, और किसीभी बहाने से एशिया में पांव जमाने को बेताब अमेरिका व पश्चिमी मित्र ताकतें इसी ताक में हैं।

द. एशिया की चिंता

अमेरिका पहले से कहता रहा है कि उ. कोरिया आतंकवाद का स्पांसर और गैर-जिम्मेदार एटमी ताकत बनकर ब्लैकमेल करता है, और दुनिया का सबसे खतरनाक मुल्क बन चुका है। चीन और भारत जसी उभरती आर्थिक ताकतों वाले एशिया महाद्वीप को लेकर अमेरिका की पहले से बनाई गई ये सुनियोजित रणनीति उसके आगे के इरादों का काफी कुछ संकेत दे देती है। इस मामले में ‘चेंज वी नीड’ का नारा देकर बुश को हराने वाले बराक ओबामा की चुप्पी भी एशिया के लिए गंभीर चिंता पैदा करने वाली है, जो भारत के पड़ोस में अपनी तथाकथित नई अफ-पाक नीति के जरिए आतंकवाद के खात्मे की लड़ाई जारी रखे हुए हैं।
डर ये है कि कहीं किम जोंग-इल की संभावित मौत (अगर हुई) से दक्षिण एशिया खतरनाक एटमी जंग का मैदान बनकर न रह जाए।

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