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तेज विकास ही सबसे बड़ी जरूरत

बजट और अर्थव्यवस्था अभी भी हमारे दिमाग को खदबदा रहे हैं। मानसून शुरू में निराश करने के बाद अब कुछ उम्मीद बंधा रहा है। निवेशकों की सारी उम्मीदें घरेलू खपत और ग्रामीण मांग पर ही टिकी हैं। अगर ग्रामीण अर्थव्यवस्था सही रास्ते पर जती है तो देश कीअर्थव्यवस्था को तुरंत ही नया जीवन मिल जाएगा, और उद्योगों को दिए गए प्रोत्साहन पैकेज भी इससे कामयाब होते दिखाई देंगे। फिलहाल अलग-अलग तरह के संकेत मिल रहे हैं, इसलिए कई मुद्दे हैं जिनका ध्यान रखा जाना जरूरी है।

पहला यह कि सरकार फिलहाल जिस आर्थिक रणनीति को अपना रही है क्या वह सही और विश्वसनीय है? कई लोग मानते हैं किपूरी दुनिया में मंदी आने के पहले ही भारत में मंदी आनी शुरू हो गई थी। आर्थिक सुधारों की हवा निकल गई थी और इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में कुछ खास काम नहीं हुआ इसलिए मंदी आ गई। गठजोड़ की राजनीति के चलते कई महत्वपूर्ण फैसले हो ही नहीं सके। यह मंदी विश्वव्यापी मंदी के एक साल पहले 2006-07 में ही दिखने लगी थी। इसलिए क्या दुनिया के मंदी से उबरने में भारत के भी उबर जाने की उम्मीद सही है? हो सकता है कि पूरी दुनिया मंदी से उबर आए लेकिन कई आंतरिक सुधार न होने के कारण हमारी अर्थव्यवस्था मंदी से ग्रस्त रहे। इसलिए हमें अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना चाहिए।

दूसरा मसला यह है कि सरकार कई तरह की बातें कर रही है। बजट में विनिवेश, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्यायिक सुधार का जिक्र नहीं है। क्या इसका अर्थ है कि सरकार ने इन मसलों को ताक पर रख दिया है? अगर इन सुधारों को बढ़ाया जाता तो इससे निवेशकों का भरोसा लौटता।

तीसरा मसला यह है कि अपने बजट में वित्तमंत्री ने सार्वजनिक खर्च को सबसे ज्यादा महत्व दिया है। सार्वजनिक खर्च में भारी वृद्धि का तभी कोई अर्थ हो सकता है, जब इसकी खर्च प्रक्रिया की गुणवत्ता सुधरे। योजनाओं के क्रियान्वयन का जो इतिहास रहा है वह चिंता पैदा करता है। सरकार ने इसके स्वतंत्र आकलन की जिस व्यवस्था की बात की है वह स्वागतयोग्य है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह व्यवस्था पहले की महालेखा नियंत्रक यानी कैग जैसी नहीं होगी। यह योजना के क्रियान्वयन के साथ ही सार्वजनिक खर्च कीगुणवत्ता जांचने की व्यवस्था होनी चाहिए। योजना आयोग के तहत काम करने वाला कार्यक्रम क्रियान्वयन विभाग ही अकेला ऐसा सरकारी महकमा है, जो खर्च की तिमाही रिपोर्ट पेश करता है, इसकी व्यवस्था को भी सुधारने की जरूरत है। सरकार ने वादे के बावजूद संसद में आउटले-आउटकम बजट और परफॉरमेंस बजट पेश नहीं किया। यह सीधे तौर पर दो साल पहले संसद में किए गए वादे का उल्लंघन है। इसका अर्थ है कि ऐसे कुछ परेशान करने वाले सच हैं जिन्हें सरकार बहस से बचने के लिए सार्वजनिक नहीं करना चाहती है।

चौथा मसला निजी निवेश का है। सरकार का इस बात पर जोर देना सही है कि सार्वजनिक खर्च के साथ ही निजी निवेश को भीप्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है। दुनिया की मंदी के चलते निजी निवेशकों के हौसले अभी पस्त हैं। नई परियोजनाओं और नएप्रस्तावों के लिए निजी निवेश अभी ज्यादा नहीं आ रहा। दूसरी, सरकार को भी बाजर से चार लाख करोड़ रुपये की धनराशि बटोरनी है इससे निजी निवेश के लिए और समस्या पैदा होगी। इसका नतीजा यह होगा कि आखिर में बाजार में जितना भी धन उपलब्ध होगा उसका ज्यादातर हिस्सा सराकर सोख लेगी और निजी परियोजनाओं में निवेश के लिए ज्यादा जगह नहीं बचेगी। और इस बात के भी तमाम संकेत हैं कि ब्याज दरें ऊपर जा सकती हैं। बाजार में नगदी की कमी और इसके साथ ही ब्याज दरों का ज्यादा होना निजी निवेशकों के उत्साह को और भी मंदा करेगा। करों में छोटी मोटी राहत और फ्रिंज बेनिफिट टैक्स के हटाए जाने जैसी चीजें निजी निवेश में उत्साह डालने के लिए नाकाफी हैं। और फिर निजी निवेश पर सिर्फ वित्तमंत्री के फैसलों का ही असर नहीं पड़ेगा। बहुत सारी चीजें इस पर भी निर्भर करेंगी कि पेट्रोलियम, भारी उद्योग, ऊर्जा और कोयला जैसे केंद्र सरकार के विभाग क्या पहल करते हैं। अगर कुल जमा नियमन में सुधार आता है तो निजी निवेश जोर भी पकड़ सकता है। भारी सार्वजनिक खर्च के लिए नगदी की उपलब्धता और निजी निवेश के लिए कब ब्याज दरों पर वित्त की उपलब्धता में संतुलन बनाना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।

वित्तमंत्री ने परस्पर विरोधी लक्ष्यों में संतुलन कायम करने की कोशिश की है और यही पांचवा मुद्दा है। उन्होंने वित्तीय घाटे के मुकाबले विकास को महत्व दिया है। उन्होंने भविष्य में महंगाई की चिंता के बजए भारी सार्वजनिक खर्च को महत्व दिया है। उन्होंने संसाधनों का इस्तेमाल मांग और उपभोग को प्रोत्साहित करने के लिए किया है। उन्होंने समावेशी विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार के जरिये ग्रामीण क्षेत्र के लिए कई खास पहल की हैं। उन्होंने यह स्वीकार भी किया है कि इसमें जोखिम है और एक बड़ा जुआ भी है। इस जोखिम का फायदा मिल पाता है या नहीं यह बहुत कुछ उन्हीं पर निर्भर करेगा। यह बहुत कुछ इस पर भी निर्भर करेगा कि दूसरे मंत्रालय और विभाग बजट में दिए गए तमाम संकेतों के अनुसार किस हद तक काम करते हैं और आपस में तालमेल बिठाते हैं। यह इस पर भी निर्भर है कि विकास को पटरी पर लाने के मसले पर कांग्रेस पार्टी में किस हद तक आम सहमति बन पाती है। यह ठीक है कि वामपंथियों के अड़ंगे की चिंता अब खत्म हो गई है, लेकिन अब कांग्रेस की भीतरी राजनीति की चिंताएं सामने आ रही हैं। आर्थिक सुधारों के मसले पर मतभेद का कांग्रेस का इतिहास काफी पुराना रहा है। पार्टी में कई लोगों का मानना है कि समावेशी विकास, नरेगा और भारत निर्माण जसे कार्यक्रमों ने पार्टी को जिताया है। लेकिन सिर्फ इन्हीं पर भरोसा करने से अर्थव्यवस्था में जान नहीं आने वाली। भारत और इंडिया के लिए पहल में कोई अंतर्विरोध नहीं है। रोजगार पैदा करने, संसाधन जुटाने और गरीबी हटाने सभी के लिहाज से तेज विकास जरूरी है। अगर विकास नहीं तेज होगा तो बहुत सारे दूसरे काम भी हम नहीं कर सकेंगे। यह सब तुरंत करना होगा, गरीबी और बेरोजगारी जिस स्तर पर पंहुच चुकी है उसे देखते हुए हमारे पास ज्यादा समय नहीं है।

nandu@nksingh.com

लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे के न्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं

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