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दमन और संयम

काफी समय पहले दिल्ली में कनाडा का एक छात्र मिला। वह गांधी के देश को देखना चाहता था। जाहिर है उसने गांधी को खूब पढ़ा और समझ होगा। मुलाकात के वक्त उसके हाथ में ‘हिंद स्वराज’ पुस्तक मौजूद थी। जैन साधुओं की दिनचर्या को जानने के बाद शंका जाहिर की थी कि इस दिनचर्या में संयम से ज्यादा दमन का संकेत मिलता है। मैंने उस शंका को मिटाने की कोशिश करते हुए कहा कि, यह प्रश्न कोई पहली बार नहीं उठा है। दरअसल संयम और दमन के बीच के अंतर को नहीं समझ पाने के कारण ही भ्रम बना हुआ है। दोनों शब्दों में उतना ही अंतर है जितना धूप और छांव, जमीन और आसमान में है। संयम शब्द की अर्थयात्रा दमन से ठीक विपरीत दिशा में चलती है। संयम में उपराम है, आश्वासन और अनुशासन है जबकि दमन में भय है, पीड़ा और तनाव है। संयम अपना घर है और दमन है पराई विशाल कोठी। एक में हम स्वयं बंद हाते हैं और दूसरे में मजबूरीवश या जबर्दस्ती जाना पड़ता है। बाहर से दोनों घर एक जैसे होते हैं। लेकिन अपने घर के अंदर स्वतंत्रता का आभास होता है और दूसरे में पराधीनता का। दूसरे के घर में वहां का रूटीन चलता है, वहां के नियमों और वक्त का पालन करना पड़ता है। संयम का अर्थ है करणीय और अकरणीय का विवेक जग जाना। दमन का मतलब है जो पा नहीं सका उसके लिए मन को मारना।

महावीर कहते हैं- जो प्रिय लोगों को प्राप्त करके भी अपनी इच्छा से उसका त्याग करता है, वह त्यागी और संयमी है। कृष्ण ने कहा है- जो मन के इंद्रियों पर संयम साधकर अनासक्त भाव से कर्मेन्द्रियों से कर्म करता है, वह विशिष्ट है।’ गांधीजी का पूरा जीवन और आंदोलन संयम के साथ चला। जबकि भारतीयों को झुका न पाने की खीज में अंग्रेजों ने दमन का सहारा लिया। भारतीय साधना पद्धति में भी दमन को कभी स्थान नहीं दिया गया है। संयम के नाम पर चलने वाले दमन की हमेशा भर्त्सना की गई है।

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