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नक्सलवाद से कैसे निपटें?

नक्सली आतंकवादियों से कैसे निपटा जाए यह मामला हमेशा ही उलझ रहा है। नीति के स्तर पर भी और राजनीति के स्तर पर भी। एक सोच यह रही है कि उनसे वैसे ही निपटा जाए, जैसे किसी दूसरे आतंकवादी से निपटा जता है। बंदूक उठाने और हत्याएं करने वाले लोगों का मकसद भले ही कितना भी अलग-अलग क्यों न हो, सरकार उनसे अलग-अलग तरह का व्यवहार नहीं कर सकती। एक दूसरी सोच यह रही है कि नक्सली समस्या क्योंकि सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन से उभरती है, इसलिए नक्सलवादियों के खिलाफ कार्रवाई करने के साथ ही प्रभावित इलाके का विकास भी किया जाना चाहिए। इस सोच के साथ ही एक धर्मसंकट भी जुड़ा हुआ है कि नक्सल प्रभावित इलाके के विकास का संदेश यह भी जाएगा कि जो हथियार उठाएगा, वह विकास पहले पाएगा। लेकिन हकीकत यह है कि इन दोनों ही तरह की नीतियां कहीं भी ठीक से जमीन पर नहीं उतरतीं। राज्य सरकारें कानून व्यवस्था की एक और समस्या मानते हुए खालिस पुलिसिया अंदाज में इससे मुकाबिल होती है। इस कोशिश में अक्सर कई जवानों और अफसरों की जान भी चली जाती है।

एक और तरीका सलवा जुडूम के रूप में आजमाया गया है, यह तरीका काउंटर टेरररिज्म का है- यानी आतंकवादियों के खिलाफ नए आतंकवादी खड़े करना। ऐसे तरीके हमेशा ही समस्या को उलझ देते हैं। यह अच्छी बात है कि गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने एक बार फिर उसी नीति पर लौटने की घोषणा की है कि नक्सलियों से आतंकवादी की तरह ही निपटा जाएगा। और यह भी स्वीकार किया है कि अभी तक नक्सलवाद के खतरे को कम करके आंका गया। उन्होंने जो आंकड़े पेश किए वे यही बताते हैं कि नक्सलवाद कश्मीर या पूर्वोतर भारत के आतंकवादियों के मुकाबले कहीं ज्यादा खतरनाक हो गया है। हालांकि समस्या यह भी है कि कश्मीर और पूर्वोतर भारत के आतंकवाद में एक अलगाववादी स्वर है इसलिए उसे, खासकर मीडिया में  ज्यादा खतरनाक ढंग से पेश किया जता है। दूसरी ओर नक्सलवाद को विकास और शोषण वगैरह से जोड़कर उसे एक तरह की सहानुभूति का पात्र बनाने की कोशिश की जाती है। गृहमंत्री ने इस नजरिये को नकारने के साथ ही विकास की बात भी की है। उनका कहना है कि नक्सलियों के दमन के बाद ही इलाके का विकास किया जाएगा क्योंकि वे विकास कार्यो में सबसे बड़ी बाधा बनते हैं। 

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