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सितारा देवी को टैगोर ने कहा था नृत्य साम्राज्ञी

सितारा देवी को टैगोर ने कहा था नृत्य साम्राज्ञी

संगीत नाटक अकादमी की फेलोशिप से हाल में सम्मानित विख्यात कथक नृत्यांगना एवं गुजरे जमाने की फिल्म अभिनेत्री सितारा देवी को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 'नृत्य साम्राज्ञी' का खिताब दिया था।

वर्ष 1938 में बंबई के अतिया बेगम पैलेस में स्वर कोकिला सरोजिनी नायडू और सर कावसजी जहांगीर समेत कुछ चुनिन्दा दर्शकों के सामने किए गए 18 वर्षीय सितारा देवी के नृत्य से गुरुदेव इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने इस युवती को 'नृत्य साम्राज्ञी' का खिताब दे दिया और उससे टाटा पैलेस में विशेष कार्यक्रम प्रस्तुत करने का आग्रह किया। वहां कथक की तमाम बारीकियों के साथ लगातार तीन घंटे तक किए गए नृत्य के बाद सितारा देवी को गुरुदेव ने बडी नृत्यांगना बनने का आशीर्वाद देते हुए शाल भेंट करने के साथ सम्मान स्वरूप 50 रुपए भी प्रदान किए और उनसे कथक जैसी भारतीय नृत्य कलाओं का पुनरुत्थान करने और उन्हें सम्मान दिलाने के लिए प्रयास करने को कहा। 

हालांकि सितारा देवी उस मुकाम पर पहुंच चुकी हैं जहां एक कलाकार लीजेन्ड बन जाता है लेकिन इस मंजिल तक पहुंचने के लिए उन्हें तमाम विरोधों का सामना करते हुए कड़ा संघर्ष करना पड़ा। जिस दौर में उन्होंने कथक सीखना शुरु किया उस समय किसी लड़की के नृत्य करने को अच्छी निगाहों से नहीं देखा जाता था। नाचने वालियां या लड़के ही कथक किया करते थे। सम्मानित परिवारों की लड़कियों से यह अपेक्षा नहीं की जाती थी कि वे कथक सीखें लेकिन सितारा देवी के पिता वैष्णव संप्रदाय के संस्कृत विद्वान पंडित सुखदेव महाराज ने कथक में धार्मिक कथावस्तु को शामिल करके अपनी बिरादरी के कडे विरोध और जाति से बहिष्कृत किए जाने के बावजूद अपनी पुत्रियों अलकनन्दा और तारा तथा पुत्रों चौबे और पांडे को यह शास्त्रीय नृत्य सिखाया। 


पंडित सुखदेव महाराज की दलील होती थी कि जब राधा कृष्ण के लिए नृत्य कर सकती हैं तो हमारी लड़कियां नृत्य क्यों नहीं कर सकतीं। नृत्य के लिए पुरुष ही उपयुक्त क्यों समझे जाते हैं। जाति बहिष्कृत होने के बाद पंडित सुखदेव महाराज कबीर चौरा को छोडकर वाराणसी के दूसरे इलाके में चले गए और वहां उन्होंने एक नृत्य विद्यालय खोलकर अपने बच्चों के साथ ही अन्य बच्चों को भी कथक सिखाना शुरु कर दिया। एक बार की बात है कि लोगों से शिकायतें मिलने के बाद कुछ पुलिस अधिकारी विद्यालय की तहकीकात करने आए तो उन्होंने उनके सामने महाभारत की कहानी पर आधारित नृत्य का प्रदर्शन कराया जिसे देखकर वे उनके प्रयासों की सराहना करते हुए चले गए। 

दीपावली की पूर्वसंध्या पर कलकत्ता में जन्मी धनलक्ष्मी (धन्नो) को बचपन में मां-बाप के लाड-दुलार से वंचित होना पड़ा था। मुंह टेढ़ा होने के कारण भयभीत मां-बाप ने उसे एक दाई को सौंप दिया जिसने आठ साल की उम्र तक उसका पालन-पोषण किया। इसके बाद ही सितारा देवी अपने मां बाप को देख पाईं। 


 उस समय की परम्परा के अनुसार सितारा देवी का विवाह आठ वर्ष की उम्र में हो गया। उनके ससुराल वाले चाहते थे कि वह घरबार संभालें लेकिन वह स्कूल में पढना चाहती थीं। स्कूल जाने के लिए जिद पकड लेने पर उनका विवाह टूट गया और उन्हें कामछगढ हाई स्कूल में दाखिल कराया गया. जहां उन्होंने मौके पर ही नृत्य का बेहतरीन प्रदर्शन करके सत्यवान और सावित्री की पौराणिक कहानी पर आधारित एक नृत्य नाटिका में भूमिका प्राप्त करने के साथ ही अपने साथी कलाकारों को नृत्य सिखाने की जिम्मेदारी भी हासिल कर ली। उस समय एक अखबार ने उनके नृत्य प्रदर्शन के बारे में लिखा था.. एक बालिका धन्नो ने अपने नृत्य प्रदर्शन से दर्शकों को चमत्कृत किया। इस खबर को उनके पिता ने भी पढा और बेटी के बारे में उनकी राय बदल गई। इसके बाद धन्नो का नाम सितारा देवी रख दिया गया और उनकी बडी बहन तारा को उन्हें डांस सिखाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई। सितारा देवी ने शंभु महाराज और पंडित बिरजू महाराज के पिता अच्छन महाराज से भी नृत्य की शिक्षा ग्रहण की। 


दस वर्ष की उम्र होने तक वह एकल नृत्य का पेशेवर प्रदर्शन करने लगीं। ज्यादातर वह अपने पिता के एक मित्र के सिनेमा हाल में फिल्म के बीच में पंद्रह मिनट के मध्यान्तर के दौरान अपना कार्यक्रम पेश किया करती थीं। नृत्य की लगन के कारण उन्हें स्कूल छोडना पडा और ग्यारह वर्ष की उम्र में उनका परिवार मुम्बई चला गया। मुम्बई में उन्होंने जहांगीर हाल में अपना पहला सार्वजनिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया. जो कथक के विकास और उसे लोकप्रिय बनाने की दिशा में उनके साठ साल लंबे नृत्य कैरियर की शुरुआत थी। 


 अपने सुदीर्घ डांसिंग कैरियर के दौरान सितारा देवी ने देश. विदेश में कई कार्यक्रमों और महोत्सवों में चकित कर देने वाले लयात्मक ऊर्जस्वित नृत्य प्रदर्शनों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया है। वह लंदन में प्रतिष्ठित रायल अल्बर्ट और विक्टोरिया हाल तथा न्यूयार्क में कार्नेगी हाल में अपने नृत्य का जादू बिखेर चुकी हैं। 


 यह भी उल्लेखनीय है कि सितारा देवी न सिर्फ कथक बल्कि भारतनाट्यम सहित कई भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों और लोकनृत्यों में पारंगत हैं। उन्होंने रूसी बैले और पश्चिम के कुछ और नृत्य भी सीखें हैं। सितारा देवी के कथक में बनारस और लखनऊ घराने की तत्वों का सम्मिश्रण दिखाई देता है। वह उस दौर की कलाकार हैं. जब पूरी.पूरी रात कथक की महफिल जमी रहती थी। मधुबाला, रेखा, माला सिन्हा और काजोल जैसी बालीवुड की अभिनेत्रियों ने उनसे ही कथक नृत्य की शिक्षा हासिल की है। 
 

सितारा देवी के व्यक्तित्व का एक पहलू फिल्मों से भी जुडा है। सवाक फिल्मों के युग में उन्होंने कुछ फिल्मों में भी काम किया। उस दौर में उन्हें सुपर स्टार का दर्जा हासिल था लेकिन नृत्य की खातिर आगे चलकर उन्होंने फिल्मों से किनारा कर लिया। फिल्म निर्माता और नृत्य निर्देशक निरंजन शर्मा ने उषा हरण के लिए उन्हें तीन माह के अनुबंध पर चुना और वह 12 वर्ष की उम्र में ही सागर स्टूडियोज के लिए बतौर नृत्यांगना काम करने लगीं। शुरुआती फिल्मों में उन्होंने मुख्यत छोटी भूमिकाएं निभाईं और नृत्य प्रस्तुत किए। उनकी फिल्मों में शहर का जादू (1934), जजमेंट आफ अल्लाह (1935),  नगीना, बागबान, वतन (1938),  मेरी आंखें (1939)  होली, पागल,  स्वामी (1941), रोटी (1942),  चांद (1944), लेख (1949),  हलचल (1950) और मदर इंडिया (1957) प्रमुख हैं। 

 

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