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रिज्यूमे के मिथक

किसी भी शख्स को नौकरी ढूंढने के लिए जिन चीजों की जरूरत होती है, उनमें रिज्यूमे का रोल सबसे अहम होता है। चूंकि रिज्यूमे ही नियोक्ता के सामने किसी भी उम्मीदवार का पहला इम्प्रैशन बनाता है, इसलिए हर व्यक्ति को अपना रिज्यूमे खुद ही तैयार करना चाहिए। यहां हम रिज्यूमे के बारे में प्रचलित कुछ मिथक और वास्तविकताएं बता रहे हैं।

मिथक: रिज्यूमे किसी उम्मीदवार के वयक्तिक इतिहास का दस्तावेज है। नियोक्ता उम्मीदवार के अब तक के जॉब्स और उपलब्धियों को जनने के लिए इसे पढ़ते हैं।

वास्तविकता : रिज्यूमे कोई ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं, बल्कि इससे बढ़कर एक प्रस्ताव होता है। हालांकि इसमें उम्मीदवार का वयक्तिक इतिहास दर्ज होता है, लेकिन इसे ऐसे अंदाज में पेश करना होता है कि चाहे गए जॉब के लिए उम्मीदवार को सबसे सही पात्र मान लिया जए। मुख्य प्रश्न यह है कि आप संबंधित पद के लिए किस सीमा तक उपयुक्त रहेंगे? केवल इसी प्रश्न का उत्तर नियोक्ता आपके रिज्यूमे में ढूंढता है, और इसमें दी गई आपकी पर्सनल हिस्ट्री एक आकर्षक रोजगार प्रस्ताव का काम करती है।

मिथक : मैंने एक बार रिज्यूमे बना तो दिया! बस, यही हर कंपनी में हर पद के लिए भेजना काफी होगा। इसमें बार-बार बदलाव की क्या जरूरत?

वास्तविकता : हर कंपनी, पद या समय के हिसाब से रिज्यूमे में बदलाव जरूरी होता है। जसे-जसे आपका उद्भव और विकास होता है, रिज्यूमे का भी होना चाहिए। नया कुछ जोड़ने को न हो तो फोकस में ही बदलाव कर दीजिए।   

मिथक : रिज्यूमे कैसा भी हो, मनमाफ़िक जॉब तो कनेक्शन की बदौलत ही मिलेगा।

वास्तविकता : अगर रिज्यूमे कंपनी, पद और समय के हिसाब से नहीं हुआ, तो कोई भी कनेक्शन काम नहीं कर पाएगा।

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