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क्या कृषि ही असल गुनहगार है?

पिछले दिनों बीटल म्युजिक ग्रुप के पॉल मैकार्टिनी ने कहा कि धरती को नुकसान से बचाने के लिए हमें सोमवार को मांसाहार नहीं करना चाहिए। इस बयान के कारण वे चर्चा में भी आ गए। खेती को लेकर पिछले कुछ समय से चर्चा तेज हो गई है कि इसके किन तौर तरीकों से पर्यावरण कोनुकसान से बचाया जा सकता है लेकिन इस बात को नजरंदाज कर दिया जाता है कि फसलें उगाना कई तरह से न सिर्फ पर्यावरण के लिए बल्किहमारी अपनी प्रजति के विकास के लिए भी नुकसानदायक हो सकता है। यह भी माना जाता है कि कृषि का आविष्कार मानव के लिए फायदे का नहीं रहा, एक विशेषज्ञ के शब्दों में यह, ‘मानव इतिहास की सबसे बड़ी गलती थी’।

यह विचार सबसे पहले कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉर्ड डायमंड के दिमाग में आया था। 1997 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘गन्स, जर्म्स एंड स्टील’ में उन्होंने लिखा कि हालांकि यह माना जाता है कि कृषि ने हमें संपत्ति, स्वास्थ्य और लंबी उम्र दी, लेकिन सच यह है कि इसने मानवप्रजति को ही नुकसान पहुंचाया है। उनका कहना है कि कृषि पिछले 12 हजार साल में विकसित हुई है, अपने शिकारी पूर्वजों की तुलना में तब से मानव कुपोषित और रोगग्रस्त है। कृषि की वजह से ही खाद्य पदार्थों का भंडारण मुमकिन हो सका और इसके चलते कुछ लोगों को भोजना काजुगाड़ करने के बजाए दूसरे काम करने की फुरसत हासिल हुई। इसकी वजह से ज्यादा बेहतर हथियार बने, सैनिक बने, युद्ध हुए। जिनके पासभोजन है और जिनके पास नहीं है इसके वर्गभेद बने। इसकी वजह से ही स्त्री पुरुष असमानता पैदा हुई। इसके बाद टॉम स्टैनडेज की किताब ‘एन इडिबल हिस्टरी ऑफ ह्यूमनिटी’ में फिर इस मसले को उठाया, उनका कहना था कि कृषि पूरी तरह ‘अप्राकृतिक कर्म’ है।
 
कैंब्रिज के लीवरहल्म सेंटर फॉर ह्यूमन एवोल्यूशनरी स्टडीज के नृतत्वशास्त्री जे स्टोक का कहना है कि कृषि ने मानव विकास को अवरुद्ध करने में बड़ी भूमिका निभाई है। वे बताते हैं, ‘शोषक और शोषित की जो विषमता आज हम देखते हैं उस सबकी शुरुआत कृषि की उत्पत्ति से ही हुई है।’मसलन शिकार करने और घूम फिर कर भोजन बटोरने वाले मानव को साल भर में 60-70 तरह का भोजना मिल जाता था लेकिन इंसान जब कृषि की ओर मुड़ा तो उसे चंद किस्म की फसलों पर ही निर्भर हो जाना पड़ा। जैसे आज ज्यादातर आबादी अपनी ऊर्जा, गेंहू, चावल और मकई से ही हासिल करती है।

इन खाद्यान्न के साथ दिक्कत यह है कि उनमें वे सारे पोषक पदार्थ नहीं हैं जो स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी हैं। और इनकी वजह से मानव के लिएरोग और सूखे का खतरा बन गया। इसकी वजह से आबादी एक जगह रहने लगी और इससे गंदगी की समस्या पैदा हुई। फिर पालतू जनवरों केसाथ रहने के कारण विभिन्न प्रजतियों रोगों का संचरण हुआ, इसका एक उदाहरण है आज का स्वाइन फ्लू। इस असर को समझने के लिए स्टोकऔर उनकी शिष्या एने स्टारलिंग ने मिस्र की नील घाटी के नौ हजार नरकंकालों का अध्ययन किया। ये कंकाल मानव इतिहास के विभिन्न दौर के हैं। इस शोध में उन्होंने पाया कि 13 हजार साल पहले शिकार वाले युग में उस इलाके के मानव की औसत ऊंचाई पांच फुट आठ इंच थी, लेकिन सात हजार साल पहले के नरकंकालों में यह ऊंचाई चार इंच तक घट गई। ऊंचाई क्यों घटी? एक संभावना है रोग। डॉ स्टोक ने एक और अध्ययन डॉ. एंड्रिया मिगालेनो के साथ अंडमान के अदिवासियों पर किया और पाया कि जब पश्चिम की औपनिवेशिक ताकते यहां आईं तो शरीर का आकार कम हो गया, लोग एनफ्लूएंज और सिफलिस जैसी बीमारियों की चपेट में आने लगे। लेकिन जिन आदिवासियों ने इन विदेशियों से दूरी बनाई रखी इसदौरान उनकी ऊंचाई बढ़ गई।
 
मिस्र के नरकंकाल बताते हैं कि चार हजार साल पहले मानव की लंबाई फिर से बढ़नी शुरू हो गई, वह और ज्यादा स्वस्थ होने लगे। शायद इसलिए कि उस दौर के लोगों ने संसाधनो को अधिकतम इस्तेमाल सीख लिया था। ये नतीजे यही बताते हैं कि कृषि मानव जति को फायदा पंहुचाने लगी उसके पहले के आठ हजर साल मानव ने खराब स्वास्थ्य के साथ काफी संघर्ष किया। डॉ. स्टोक के शब्दों में, ‘बिना अतिरिक्त खाद्य पदार्थों के आज हमारे पास जो तकनीकी विकास है वह नहीं होता। मसलन मैंने अपनी सारी जिंदगी स्कूल में बिता दी। जो कुछ भी सीखा अब वह छात्रों को कुछ ही महीने में सिखा देता हूं। वे आगे चलकर ज्ञान को और बढ़ाएंगे व मुझसे भी बड़े विशेषज्ञ बनेंगे। बिना कृषि के हम लगातार एक के बाद एक आविष्कार नहीं कर सकते थे और ऐसा भी नहीं है कि शिकार वाले दौर में मानव के साथ सब कुछ अच्छा ही था। शिकार करने वाले और खाद्यपदार्थो को ढूंढ-ढूंढ कर जमा करने वाले मानव का जीवन बहुत शांत और चिंता मुक्त नहीं था। हालांकि कई नृतत्वशास्त्रियों ने इसका चित्रण कुछइसी तरह किया है। भले ही उस दौर में मानव को शिकार के साथ ही कितनी ही तरह की सब्जियां और फल मिल जाते हों पर ज्यादातर के लिए जिंदगी ‘क्रूर, बर्बर और छोटी’ थी। डॉ मिगालेनो इस नतीजे पर पहुंचे कि उस दौर के फिलीपींस में औसत उम्र 19 साल थी। इसका अर्थ यह हुआ कि 14 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते ज्यादातर लड़कियां कम से कम एक बच्चे की मां बन जाती होंगी। कई दूसरे अध्यनों में यह पाया गया कि शिकार वाले दौर में 15 फीसदी नौजवानों का कत्ल हो जाता था।

हारवर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रिचर्ड रेंघम का आकलन है कि दो विश्वयुद्धों और आज की हिंसा में उतने लोग नहीं मारे जाते जितने कि कृषि केआगमन से पहले मारे जाते थे। डॉ. स्टोक का कहना है कि अब हम उस जगह पहुंच गए हैं जहां से वापसी मुमकिन नहीं। कृषि ने हमें अतिरिक्त खाद्य पदार्थ दिए जिसकी वजह से औरतें ज्यादा बच्चे पैदा कर सकती थीं, इसी की वजह से आज दुनिया की आबादी सात अरब तक पहुंच चुकी है।उनका कहना है, ‘आज की बहुत सी समस्याओं की जड़ कृषि में है, लेकिन हम इतने माहिर तो हैं कि इन सबका तकनीकी समाधान ढूंढ ही लेंगे।हमारे सामने पर्यावरण और समाज की कई भीषण समस्याएं हैं। अब हम उनसे कैसे निपटते हैं इस पर निर्भर करेगा कि भविष्य के पुरातत्वशास्त्री और नृतत्वशास्त्री हम पर कितना गर्व करेंगे या कितना अफसोस।’


लेखिका पत्रकार, उपन्यासकार और टेलीविजन प्रस्तोता हैं
ब्रिटिश अखबर ‘द टेलीग्राफ’ से साभार

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