DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

चीन: अल्पसंख्यकों के दमन की नीति

उइगुर समुदाय का होने के नाते मैं अपने माता-पिता के शहर उरुम्की के दंगों, मौतों, जख्मों और गिरफ्तारियों से भयभीत हूं। मेरा उनसे संपर्कछूट गया है और मैं शिन्जियांग से आने वाली खबरों पर ही निर्भर हूं। मुझे सरकार के उन आंकड़ों को मानना ही है जिसके मुताबिक 156 लोग मारे गए 1000 से ज्यादा जख्मी हुए और 1400 गिरफ्तार हुए। वास्तव में इन आंकड़ों पर मुझे संदेह है। थियेनआनमन चौक के प्रतिरोध में मैं एक छात्र नेता था। मैं आज भी उन भरोसेमंद सरकारी आंकड़ों का इंतजार कर रहा हूं जो यह बता सकें कि 4 जून, 1989 को कितने लोग मारे गए थे। पर मुझे इस बात पर हैरानी हो रही है कि जब मेरे देश में राजनीतिक रूप से कुछ नहीं बदला है, मैं और मेरे जैसे अन्य लोग अभी भी राजनीतिक वनवास में जी रहे हैं, तब यह आंकड़े इतने ऊचे और सटीक कैसे हैं?

इससे मैं एक ही निष्कर्ष निकाल पाता हूं कि सरकार शिन्जियांग की उइगुर आबादी, व्यापक चीनी जनता को एक क्रूर और रत्ती भर बर्दाश्त न होने का संदेश और बाहरी विश्व को यह बता देना चाहती है कि उइगुरों के असंतोष को ताकत से कुचला जाएगा। निस्संदेह चीन यह भी उम्मीद करता है कि जब वह सड़क पर मारे गए नागरिकों के आंकड़े जारी करे तो उसे चीन की प्रमुख हान आबादी का समर्थन प्राप्त हो। वहां पर व्यापक सहमति यह है कि उइगुरों और तिब्बतियों के प्रभुत्व वाले इलाकों पर जब से हान आबादी ने कब्जा जमाया है, तब से वहां की जनता को स्थानीय सामंती शासन से मुक्ति के साथ समृद्धि हासिल हुई है। इस मायने में चीन के सांस्कृतिक प्रभुत्व के शासन का सारा विरोध एक तरह की दगाबाजी मानी जाती है।

चीन की हान संस्कृति ऐसी किसी बात पर तत्काल प्रतिक्रिया व्यक्त करती है जिसे वह राष्ट्रीय स्वाभिमान पर हमला समझती है। हान संस्कृति की  चीनी होने की अवधारणा में अक्सर जातीय मान्यता मिली होती है। इसके अलावा औसत चीनी अपने को अल्पसंख्यक समुदाय का आका मानता है और यह समझता है कि वही उसकी चेतना और समृद्धि का विकास कर सकता है। यहां जातीय अल्पसंख्यक समुदायों के लिए संवेदनशीलता बहुत कम है। हान आव्रजकों के बढ़ते दबाव के कारण वे राजनीतिक रूप से दमित और पिसे हुए महसूस करते हैं। स्थानीय आबादी को पिछाड़ने के लिए ही उरुम्की और ल्हासा जैसे शहरों में बड़े पैमाने पर हान जाति के लोग आकर बसे हैं। मैं राजनीतिक निर्वासन में इसलिए हूं क्योंकि मैं 1989 में राजनीतिक सुधार के लिए उठ खड़ा हुआ था। मुझे अफसोस है कि इस कठिन समय में मैं अपने माता-पिता के साथ नहीं रह पा रहा हूं। पर मैं अब भी मानता हूं कि राजनीतिक दमन से छुटकारा पाने के लिए लोकतंत्र अंतिम साधन है। मेरा यह भी मानना है कि लोकतंत्र को राष्ट्रवाद के हितों का साधन नहीं बनना चाहिए। मेरी दलील यह नहीं है कि शिन्जियांग या तिब्बत की आजादी हमारी समस्याओं का समाधान है। पर मैं यह जरूर कहूंगा कि जातीय आत्म-निर्णय है। इसे मैं एक मौलिक अधिकार मानता हूं। मतलब जातीय रूप से अलग उइगुरों को यह तय करने का हक है कि क्या वे चीन के साथ रहना चाहते हैं।


शिन्जियांग के लोगों को यह विकल्प कभी नहीं दिया गया। उरुम्की के लोग ऐसे शहर में बसते हैं जहां 70 प्रतिशत आबादी हान हो चुकी है। उइगुर लोग मंगलवार को उस समय छुप गए थे जब हजारों हथियारबंद चीनी सड़कों पर ‘उइगरों को खलास करो’ कहते हुए घूम रहे थे। इन स्थितियों पर उइगरों भावनाएं भड़कीं तो सरकार ने उन्हें अलगाववादी और उग्रवादी बता कर गोली मारने का हुक्म दे दिया। मैं चीन का हूं, पर मैं उस देश में राष्ट्रवादी नहीं हो सकता जहां पर राष्ट्रवाद लोकतंत्र को कुचलता है और वह विरोध व असहमति के क्रूर दमन का बहाना है। उइगुर राजनीतिक रूप से सताई गई जातीय आबादी है और राजनीतिक दमन से ही सांस्कृतिक और आर्थिक दमन शुरू होता है। मैं तो यही सोचने को बाध्य हूं कि हताहतों की संख्या को तुरंत जरी कर सरकार ने यह संदेश दिया है कि शिन्जियांग के स्थानीय लोगों को आम चीनियों जैसा अधिकार भी नहीं हासिल है। या सरकार यह दिखाना चाहती है कि वे किस तरह के घरेलू आक्रोश के लायक हैं। मैं यही उम्मीद कर सकता हूं कि दुनिया यह समझ रही है कि चीन ने अपनी सीमाओं के भीतर दमित अल्पसंख्यक समूहों के खिलाफ युद्ध घोषित कर दिया है।


ब्रिटिश अखबार ‘गाजिर्यन’ से साभार

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:चीन: अल्पसंख्यकों के दमन की नीति