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अस्वस्थ प्रतियोगिताएं

टीवी के पर्दे पर अपने नन्हें-मुन्नों को देखने के मोह में मां-बाप आतुर हो रहे हैं। हर चैनल पर गायन और नृत्य-प्रतियोगिताएं आम आदमी को लुभा रही हैं। इन का उद्देश्य क्या है? रुपया कमाना या नई प्रतिभाओं को मंच पर लाना, प्रोत्साहन देना? यह सही भी हो तो भी वर्तमान ढांचा कुछ गिने-चुनों को ही उत्साहित कर पाता है। अधिकतर को हताशा की ओर ढकेल देता है। आठ-नौ साल के बच्चे में सुर की पहचान और अनोखी गायन प्रतिभा रोमांचित करने वाली है। पर पीछे रह जाने वाले जार-जार रोते हैं। उनके मां-बाप उनसे ज्यादा आहत दिखाई पड़ते हैं। अक्सर आक्रोश भी सामने आता है। जो बच्चों के लिए हितकर नहीं। इस कोमल आयु में उन्हें पलोसने की जरूरत है। जिन्दगी भर के लिए मन के दर्पण पर दरार डालने की नहीं। जर्मन कवि गेटे ने लिखा था, ‘हम बच्चों को प्यार करते हैं, उनको सराहते हैं तो वर्तमान गुणों के लिए नहीं बल्कि भविष्य की संभावनाओं के लिए।’

इतनी कच्ची उम्र में नाकारा साबित कर देना बाल-मनोविज्ञान के विरुद्ध है। प्रतियोगिताओं की पहली, दूसरी और तीसरी सीढ़ियों पर पहुंचने की होड़ परिपक्व लोगों के लिए ठीक है। वे लोग चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। इतने छोटे बच्चों में असफलता हीन भावना पैदा करती है। फिर सफलता पाने वाले इतनी छोटी उम्र में प्रसिद्धि पाकर अहंकारी बन सकते हैं। उनकी प्रतिभा का विकास अवरुद्ध हो सकता है। इस तरह के प्रदर्शन और तत्काल फल पाने की प्रवृत्ति कला को पनपने नहीं देती। और बच्चों के अधिकारों का जो हनन हो रहा है- उसका क्या होगा? आज की जिन प्रसिद्ध फिल्मी अभिनेत्रियों को बचपन से ही काम करना पड़ा वे आज भी अपना बचपन खो जाने का मलाल करती हैं। बड़े-बड़े कलाकारों के सामने प्रदर्शन हो ओर सलीके से बिना ठेस पहुंचाए वे इन बच्चों का मार्ग-दर्शन करें। बस इतने तक ही इन कार्यक्रमों का प्रारूप बनाया जए तो बच्चों को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी।

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