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कदम कदम बढ़ाए जा

फ्रांस के चैंप एलिसीज़ एवेन्यू में भारत के कलगीधारी सैनिकों के मार्च पास्ट के दृश्य काफी भव्य हैं। इससे ज्यादा गौरव की बात यह है फ्रांस की क्रांति की 220वीं वर्षगांठ के मौके पर हुए बास्तील परेड में मुख्य अथिति के तौर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की शिरकत। एक ऐसी क्रांति की सालगिरह के मौके पर जिसने पूरी दुनिया समेत भारत की आजादी की लड़ाई और फिर लोकतंत्र की स्थापना को समता, स्वतंत्रता और भाईचारे के आदर्श दिए थे। सात समुंदर पार फ्रांस की इस राष्ट्रीय परेड में भारतीय सैनिकों के ‘कदम कदम बढ़ाए जा’ की धुन पर मार्च पास्ट का एक प्रतीकात्मक महत्व भी है कि भारत ने विश्व राजनय में अपने कदम तेजी से बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। फ्रांस ने इस मौके पर भारत को जो महत्व दिया वह इसकी एक कड़ी भर है। दुनिया के लगभग हर बड़े मंच पर, चाहे वह जी-5 हो या जी-7 या फिर आसियान भारत इस समय हर जगह किसी न किसी रूप में मौजूद है। भारत और फ्रांस के बीच हर साल शिखर वार्ता करने का फैसला फिलहाल दोनों देश एक दूसरे के लिए अहमियत रखते हैं।

अभी कुछ समय पहले जब अमेरिका में रिपब्लिकन की सरकार थी तो विदेश नीति की आलोचना में यह कहा जा रहा था कि भारत ने अपने सारे अंडे एक ही घोसले में रख दिए हैं और डेमोक्रेट की सरकार आते ही उसे परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। बराक ओबामा के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद इस खतरे की बातें कुछ ज्यादा ही जोर से की जाने लगीं थीं। हालांकि ऐसी आलोचना में इस बात को नजरंदाज कर दिया जाता है कि एक आर्थिक ताकत के रूप में भारत अब इतना महत्वपूर्ण हो चुका है कि दुनिया में किसी के लिए भी उसे नजरंदाज कर पाना आसान नहीं होगा। चाहे वे अमेरिका के डेमोक्रेट ही क्यो न हों। पिछले कुछ समय से भारत जिस तरह से रूस से अपने रिश्तों को नई दिशा दी है और अब फ्रांस के साथ एक नई शुरुआत की है वह यह तो बताता है कि विदेश नीति के मोर्चे पर बहुत कुछ हो रहा है। हो सकता है कि इन रिश्तों का कुल जमा हासिल बहुत नाटकीय न हो, लेकिन भारत ने शायद ऐसी उम्मीदें भी नहीं बांधी हैं। भारत को अगर इससे आतंकवाद और ऊर्जा जैसे मसलों पर ही सहयोग मिलता है तो यह भी कोई छोटी बात नहीं होगी।

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